Wednesday, August 21, 2013

ग़ज़ब ढायो "कांदा" जुलम भयो रे.......

शुरूवात मौजूदा दौर के भविष्य के एक फिल्मी डॉयलाग से....जहां एक लड़की सार्वजनिक रूप से छेड़छाड़ का शिकार होने पर कुछ इस तरह की बद्दुआयें दे रही है..." जा कमीने जा...भगवान तूझे तेरी इस ज़लील हरक़त के लिये कान्दे के एक-एक छिलके के लिये तरसाये....तुझे रसभरे प्याज़ का ईक टुकड़ा तक नसीब ना हो..."या फिर एक माँ अपने बच्चे से कह रही हो..." सो जा बेटे सो जा...वरना गब्बर घर की सारी प्याज़ उठा कर ले जायेगा..." ।
 वल्लाह क्या कोहराम मचा हुआ है महज़ एक कान्दे (प्याज़) के नाम पर....विपक्षी पार्टियां सरकार पर तोहमत पर तोहमत लगाये जा रही हैं....ईल्ज़ामों का दौर अपने शबाब पर है और इस देश का सबसे बिचारा कहलाने का दर्जा पाने वाले मध्यम वर्गीय परिवार के किचन से प्याज़ लगभग नदारत सा हो चला है....ख़ैर क्यों ना हो..?? 80 रूपये किलो में तो सरकार की अनुकम्पा से 80 किलो चावल का जुगाड़ किया जा सकता है तो फिर कांदे की परवाह काहे की जाये भई....?भारत के सर्वाधिक प्याज़ उत्पादक क्षेत्र नासिक में मौसम की मार झेल रहे किसानों की फसल पर आफत के परकाले गिर आये लिहाज़ा प्याज़ की कीमतों में बेतहाशा उछाल एक जायज़ प्रतिक्रिया थी....मुझे ईल्म है कि एन.डी.ए. सरकार के कार्यकाल के दौरान भी एक बार प्याज़ के दामों में इसी तरह बिजली गिरी थी...मसलन यह साफ है कि सरकार भले चाहे किसी की भी हो ये मुई महंगाई कम होने का नाम ही नहीं ले रही है...। साहेबान ये हालात हमें भविष्य की भयावह तस्वीर की ख़ौफनाक झलकियां दिखला रहे हैं....अगर आप आंकड़ो पर विश्वास रखते हैं तो इस ज़मीनी हक़ीक़त को मान लिजिये कि महंगाई की यह आफत अगर 25% आसमानी बला से उपजी है तो 75 फीसदी जनता को सौगात के तौर पर दी जाने वाली मुफ़्तखोरी से उपजी है ।
मैं छत्तीसगढ़ की माटी की देन हूं लिहाज़ा मै अपने ही राज्य के बारे में कहना चाहूंगा की मौजूदा सरकार इन दिनों सस्ता अनाज बांट-बांट कर उकता चुकी है सो नया पैंतरा ईस्तेमाल किया जा रहा है...सायकल/सिलाई मशीन/चप्पल/गाय/बैल और ना जाने क्या-क्या बेतहाशा बांटे जा रहे हैं....ट्रकों और मेटाडोरों में लाद कर लायी गयी जनता को जगह-जगह सभाये कर पैदल यात्रा/चप्पल यात्रा/जूता यात्रा/कपड़ा यात्रा बनाम यात्राओं के नाम पर बुला-बुला कर वस्तुओं का बंटवारा किया जा रहा है....तो जनाब कहने का मक़सद यह है की गोया यह सब चीज़ें आख़िरकार आती कहां से हैं...???ज़ाहिर सी बात है कि बांटने के लिये ईन्हें खरीदना भी पड़ता होगा....जिसके लिये पैसों की भी दरकार होती होगी....और सरकार के पास पैसा कहां से आता है यह बताने की ज़रूरत कम से कम इस प्लेटफार्म में तो हरग़िज़ नहीं है....सरकारी बजट हमेशा घाटे का भोंपू बजाता है कि फलाने क्षेत्र में इतने का घाटा हुआ...ढेकाने क्षेत्र में इतने का घाटा हुआ तो मांई-बाप ये मुफ़्तखोरी की रक़म क्या आप अपने ससुराल से लाते हैं जो चना-मुर्रे की तरह आम किये हुये हैं....??? अदना से कांदे की कीमत में उछाल हुआ, लगे सरकार को कोसने....पैट्रोल-डीज़ल के भाव बढ़े, लगे सरकार की फजीहत करने...किसी को कोसने-काटने से बेहतर है अपनी आदत में सुधार लाना....स्व.श्रीराम शर्मा जी ने भी कहा था कि हम बदलेंगे तो युग बदलेगा...पर ये चंद लोग हैं जो बदलने का नाम तो दूर बदलाव को मटिया-मेट करनें में तुले हुये हैं....ईधर रस्साला भारतीय रूपया रसातल में जाने को आतुर है वहां ये कांदा दिमाग का दही करने में तुला हुआ है । कभी-कभी तो लगता है कि सरकार से आर.टी.आई. के तहत पूछ ही लूं कि इन सब मुफ़्तखोरियों में कितनी रक़म का सत्यानाश किया है...पर घर-परिवार वाला हूं...घबरा जाता हूं क्योंकि छ.ग. में वर्ष 2012 को इंदिरा गांधी कृषि वि.वि. में हुये एक कार्यक्रम के दौरान एक शख़्स अनवर हुसैन ने सीधा प्रदेश के मुखिया को कह दिया था कि सरकार धान की उत्पादकता के जो आंकड़े बता रही है वो सरासर ग़लत है....फिर क्या बिचारे को जेल की हवा खानी पड़ी....परिवार को फजीलत अलग सहनी पड़ी...।
सत्ता के पावर के क्या कहने भई अच्छे-अच्छे तीस मार ख़ांन निपटा दिये जाते हैं फिर हमारी क्या बिसात....किचन से खाना बनाने वाली दीदी आवाज़ दे रही है..."भैय्या प्याज़ ख़त्म हो गयी है...लेकर आओ.."लिहाज़ा हम चुपचाप कांदे के कटने से पहले आँसू बहाते हुये प्याज़ लेने के लिये रवानगी भरते हैं....कमबख़्त एफ.एम.चैनल भी मुंह चिढ़ाता हुआ गीत सुना रहा है...जिसके बोल हैं "आमदनी अठन्नी..ख़र्चा रूपईय्या..........................॥