Tuesday, March 5, 2013

अल्पसंख्यक ग़रीब


मेरे एक मित्र जो की वारंगल आन्ध्र प्रदेश में रहते हैं..पेशे से किसान हैं...कल रात उनका फोन आया...
जनाब बड़े परेशान लग रहे थे....मैनें कहा मियां क्या बात है..?आख़िर इस परेशानी का सबब तो बतलाओ...
जब्बन मियां हैदराबादी ज़बान में तपाक से बोले....ये तुमईच लोगों की क़ारस्तानी हैं मियां जिसने हमें ग़फलत में डाल रखा है....
ले-दे के 11 एकड़ की ख़ेतीईच बाक़ी है उस पर भी हल चलाने वाले ग़ायब है मियां.....॥
 मुआमला मुझे ज़रा गंभीर लगा...मैनें कहा जब्बन मियां आपके यहां तो मज़दूर आसानी से मिल जाते हैं....आख़िर कौन सी बात हो गयी जो हालात इस क़दर बदतर हो गये...??
 जब्बन मियां बोले ये मज़दूरां मेरे को कहते हैं की पड़ौसी मुलुक (उनके मुताबिक़ हमारा राज्य) में बिटिया ब्याही है..हमारे दामाद भी उने खेतों में मजदूरी करते हैं...उने कई-कई दिन काम में नई जाते हैं फिर भी उने राशन-पानी की कोई कमी नई होती...उने की सरकार रूपया-दो रूपया में खाने को चावल चना उनके घरों तक पहुंचा जाती है...तुम हमें क्या देते हो मियां....इससे अच्छा है हम भी वहीं की रवानगी भर लें....
जब्बन मियां ने तो अपने दिल के फोड़े फोड़ लिये पर मौजुदा हालात का मवाद मेरे लैपटॉप के की बोर्ड पर बहा चला आया...यक़ीनन क्या इस राज्य में ग़रीब होना भी एक तरह का वरदान है..??
 खाने को सस्ता चावल/चना सरकार की नमक हलाली के लिये मुफ्त का नमक.....और बूढ़े-बुज़ुर्गों के लिये अब फ्री की तीर्थ यात्रा....
हे मेरी अति संवेदनशील सरकार...कुछ ध्यान ज़रा हम अल्प संख्यक गरीबों पर भी डालो.....महंगा चावल...महंगी दाल..महंगा तेल और 25 रूपये का टाटा नमक खाते-खरीदते जान आफत में आ गयी है...
और आपकी की इस दरियादिली का ख़ामियाजा गाहे-बिगाहे हमें ही उठाना पड़ता है, पल-पल बढ़ती महंगाई को गले लगाकर....वैसे पड़ौसी राज्यों के मजदूर भी आजकल एक नारा पुरज़ोर बुलंद कर रहे हैं जो कहता है "मैं आवत हवव फोकट के भात खाये बर"