Sunday, March 11, 2012

दास्तान बिखरे फूलों की......

पुष्प की अभिलाषा आपने बेशक सुनी होगी..जिनके अंदर मातृभूमि पर सर्वत्र न्यौछावर कर देने वाले वीरों के पग पर बिछ जाने की मंगल भावना कूट-कूट कर भरी हुई होती है...पर यही फूल जब किसी राजशाही या सीधे-सीधे लफ्ज़ों में कह लिजिये सरकारी आयोजन की शोभा बनते हैं तब उनके हालात बदतरी की मिसाल होते हैं...छत्तीसगढ़ प्रदेश के मुखिया अर्थात माननीय मुख्यमंत्री साहब ने 11 मार्च 2012 को अपने विधायकी क्षेत्र तथा प्रदेश की कथित संस्कारधानी नगरी राजनांदगाँव में होली मिलन समारोह का वृहद आयोजन रखा...ज़ाहिर तौर पर जिस आयोजन का सरमायी मुख्यमंत्री साहब ख़ुद हों उसकी चमक-चाँदनी की आप कल्पना बेहतर कर सकते हैं....एक पत्रकार होने के नाते मुझे भी उस आयोजन का निमंत्रण पत्र प्राप्त हुया वो भी बाक़ायदा तीन-तीन...पहला श्रीमान जनसंपर्क अधिकारी ने भेजा दूसरा युवा मोर्चा के कर्मठ कार्यकर्ताओं ने और तीसरा महिला भाजपा कार्यकर्ताओं ने....
हमने भी कुछ साथियों के साथ सी.एम.साहब के नये नवेले चमचमाते हुये बंगले की तरफ रूख़ किया....पुलिस की चाक चौबंद व्यवस्था....जगह-जगह बैरीक्रेट्स के कारण यातायात व्यवस्था की सरेआम उड़ती धज्जियों के बीच होली मिलन समारोह बनाम सरकारी आम लंगर के नाम पर किराये की ऑटो/ट्रको/बसों में लाद कर लाई गयी जनता की धक्का-मुक्की खाते हुये हम आयोजन स्थल के प्रवेश द्वार में पहुंच ही गये...समारोह का माहौल अपने पूरे शबाब में था...प्रवेश द्वार के पास ही पेमेंट प्राप्त कलाकारों का दल फाग की मस्ती बिखेर रहा था....एक से बढ़कर एक फाग गीत कान फोड़ू संगीत के साथ गाये जा रहे थे....कुछ सम्मानीय महिला नर्तक जबरदस्त तरीके से छत्तीसगढ़ी नृत्य का दर्शन करा रही थी....आँखो को थोड़ी देर विश्राम देने के बाद हम आगे की ओर बढ़ लिये जहां सी.एम.साहब जनता से शुभकामनायें ले रहे थे....सौ बाई सौ के उस आलीशान पंडाल में सरकार के सभी नुमाईन्दे/छुटभैईय्ये से बड़े भईय्ये नेता भरे पड़े थे...सी.एम. साहब स्थानीय सांसद के साथ निरंतर खड़े रहकर जनता का आशीर्वाद ग्रहण करने के साथ फोटो सेशन करवा रहे थे...तभी एक अनजाने पुलिस वाले ने हमे सी.एम.साहब के नज़दीक जाने से रोका...हमने उसे अपने प्रेस कार्ड का हल्का सा झलक दर्शन करा दिया...उसने भी बड़े सम्मान के साथ कहा आईये सर...मेरे पीछे मेरे तीन साथी भी पंडाल के अंदर हो लिये जिसे देखकर शहर कोतवाली के टी.आई. श्री विश्वास चन्द्राकर ने आकर मुझसे कहा की पुलिस वालो को खूब घुड़की देते हो भाई...मैनें कहा साहब आप तो सबको देते रहते हो कभी-कभी ले भी लिया करो...
बहरहाल अंदर का मुज़ायरा किसी शाही शादी के सरीके का था वहीं पास खड़े सहारा समय के पत्रकार साथी से किसी ने पूछा कि क्या होली मिलन है बॉस...उसने कहा की होली मिलन??हमें तो दिवाली नज़र आ रही है...साहेबानो पर फूलों की बरसात हो रही थी...कोई गुलाब बिखेर रहा था तो कोई गेन्दा...जिसकी जैसी हैसियत वैसे फूल....पैरों की नीचे फूल...सर के उपर फूल यदा-कदा सर्वत्र बिखरे फूल मैनें कहा हाय रे फूल...क्या है तेरा भाग्य? की कभी तू देश पर मर मिटने वालों के उपर चढ़ाया जाता है तो कभी मट्टी पलीद करने वालों के उपर....ज़ाहिर है की यह पुष्प की अभिलाषा हरगिज़ नहीं होगी पर क्या किया जा सकता है यह उसका नवीनतम भाग्य है जहां उसे अपने अस्तित्व पर कभी-कभार की अभिमान होता होगा...उस पंडाल के बाहर खूले मैदान पर शाही लंगर जारी था मुफ्त मे मिलने वाले शाही खाने पर टूट पड़ने वालों की कमी ना थी...पर लोगों को वहां खाने की प्लेटें भी नसीब नहीं थी...किसी ने दबी ज़ुबान से कहा कि खाना बनाया दो हज़ार लोगो के लिये और बुला लिया 10 हज़ार को...अब किसी को ख़ाक मिलेगा खाना...कुछ देर तक भोजन व्यवस्था का नज़ारा देखने के बाद हमें उस शख्स की बातों पर पूरा यक़ीन हो गया और हम वहां से कट लिये...लौटने के रास्ते पर बिखरे हुये फूल मायुसी से हमें और प्रदेश में चल रहे अतिक्रमण के नाम पर बेघर-बार हुये लोगों की तरफ देख रहे थे जो की साहब को ज्ञापन सौंपने आये थे...कानों मे माखनलाल चतुर्वेदी जी की कविता पुष्प की अभिलाषा गूंजायमान होती रही..और हमें फूलों की बेबसी पर नयी पोस्ट लिखने का ख्याल आया जो आप सभी के लिये हाज़िर है...॥

10 comments:

  1. भाई बेगानी शादी मे अब्दुल्ला दीवाना और वैसे भी चुनाव नजदीक है तो ये चादर के बाहर जरूर पैर फैलाएँगे

    ReplyDelete
    Replies
    1. अमित जी ना तो ये बेगानी शादी थी ना कोई अब्दुल्ला यहां दीवाना था..इस पूरे मसले का तो बस यही एक फसाना था की जिस प्रदेश की जनता समस्याओं से आये दिन जूझ रही है वहां पर मासूम फूलो को बेरहमी से कुचले जाने(अनावश्यक खर्च) की क्या ज़रूरत है...शुक्रिया आपका पोस्ट पर टिपयाने के लिये....

      Delete
    2. "साहब बात तो 16 आने सच है पर सिस्टम को को तो आप मुझसे बेहतर जानते है। वैसे आप की लेखनी की जितनी तारीफ की जाए कम है ॥
      आप के उजवाल भविष्य की कामना के साथ जय महाकाल"...

      Delete
  2. पुष्प की अभिलाषा वाली भावुकता और पुष्पों के प्रति अपने अनुराग के आलोक में यह पोस्ट बहुत बढ़िया है ! भीड़ बनाम अनियंत्रित / अपर्याप्त खाद्य व्यवस्था और अकुशल आयोजन के दृष्टिकोण से भी यह पोस्ट बहुत बढ़िया है !

    पर ...

    इस आयोजन का दूसरा पक्ष भी है ! टेंट हाउस , भोजन और पुष्प व्यवसाय से जुड़े कितने ही दिहाड़ी मजदूरों की एक दो दिनों की रोजी रोटी की बरकत / पुण्य भी इसमें शामिल माना जाये !

    ReplyDelete
    Replies
    1. अली साहब मानना पड़ेगा आपको....बात पते की कही आपने..पर यही टेंट/भोजन व्यवसाय से जुड़े लोग अपने बिल को पास कराने के चक्कर में चप्पले घिसते हैं तो बड़े लाचार नज़र आते हैं.......खैर पुण्य की आस पाप के दंश झेलकर ही पैदा होती है....शुक्रिया आपके टिपयाने का......

      Delete
  3. ek katoo satya se sammna karba diya aapne.....dukhdayee.....

    ReplyDelete
    Replies
    1. शुक्रिया मृदुला जी...आप मेरे ब्लॉग पर आई उसके लिये आपका आभारी हूं....

      Delete
  4. ऐसा ही नजारा उत्तर प्रदेश के मुखिया अखिलेश यादव के शपथ समारोह के बाद देखने को मिला था, फूलों को तोड़ते नोचते लोगों को देखकर लगता था जैसे वे वोट लेकर वोटरों की भावनाओं को नोच रहे है।

    ReplyDelete
  5. बजा फरमाया सुज्ञ जी...फूलों की बेचारगी पर दिल से सिर्फ एक लफ्ज़ निकल कर बाहर आता है "उफ़" आप मेरे ब्लॉग पर आये उसके लिये शुक्रिया......

    ReplyDelete
  6. The story about the innocent flower...
    keep it up Ali Sir.....

    ReplyDelete