Saturday, December 10, 2011

दहशत की ज़द में अब मीडिया भी.....


तारीख़ गवाह है कि भले ही मीडियाकर्मियों पर सैटिंग अथवा वसूली के आरोप-प्रत्यारोप लगते रहे हैं लेकिन समाज के इस कथित चौथे स्तंभ की सक्रियता से इस देश में हो रहा अरबों का भ्रष्ट्राचार थोड़ा ही सही पर कंट्रोल में है । यक़ीनन ये मीडिया ही है जिसकी वजह से राष्ट्र्मंडल खेलों में हुआ व्यापक भ्रष्ट्राचार उजागर हो सका । ये मीडिया की ताक़त ही है की संसद में पैसे लेकर सवाल पूछने वाले दुर्योधनों को राजनीत की महाभारत में शिकस्त झेलनी पड़ी । ये मिडिया ही है जिसमें भारत की सरकारों पर सर्वोच्य पदों पर आसीन व्यक्तियों का घिनौना चेहरा जनता को दिखलाने का भरपूर माद्दा है । मीडिया ने ही इस देश में अनाचारी आई.पी.एस. और भ्रष्ट्राचारी आई.ए.एस. अधिकारियों को बेनक़ाब करनें में अहम भूमिका निभाई है लेकिन यही मीडिया अपनी इसी बेबाकी की वजह से हमेशा ही राज्य तथा केन्द्रिय सरकार की आँख में कांटे की तरह चूभता रहता है ।
पिछले हफ्ते ही एक नये तथा तेज़ी से प्रसिद्ध हो रहे एक दैनिक अख़बार नें छत्तीसगढ़ में सरकार के काम-काज पर तल्ख़ क़लम चला कर सनसनी फैला दी  थी । इसी अख़बार ने हाल में ही मध्यप्रदेश में लीज़ पर गयी बेशकीमती खदानों के बारे में प्रदेश के मुखिया के उपर आरोपों की चंद बून्दे टपकाने का अदम्य साहस भी दिखाया और इस मामले में उसका साथ दिया मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के एक लोकप्रिय समाचार चैनल नें । निश्चित तौर पर यह बात प्रदेश की राजनीति की बागडोर संभाल रहे आकाओं को नाग़वार गुज़री और उन्होनें एक फरमान जारी कर उक्त समाचार चैनल का मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में जारी प्रसारण केबल ऑपरेटरों को निर्देशित कर बंद करा दिया । अब संभवतः अगली बारी उस समाचार पत्र की भी हो सकती है जिसे उक्त समाचार चैनल के प्रसारण पर रोक लगाकर एक तरह से सीधी चेतावनी दे दी गयी है । अब मीडियाकर्मियों को भी ज़िंदगी गुज़ारने के लिये ज़ाहिर तौर पर रोज़ी-रोटी की ज़रूरत पड़ती है लिहाज़ा बाक़ी सब  समझौते के अघोषित कागज़ों पर हस्ताक्षर कर दिये और सरकारी भौंपू की आवाज़ हमेशा की तरह बुलंदगी के मक़ाम तक पहुंचाने की क़वायद में भिड़ गये । रह गया तो उस समाचार चैनल का वह साहसी स्टॉफ जिसने वो कहने और करने का साहस किया जो सरकारी दहशत की ज़द में आये लोगों के पास नहीं था । इस मामले में अब तक कोई कुछ भी साफगोयी से खुलकर कहने को राजी नहीं है । हर तरह एक अजीब सी ख़ामोशी छायी हुई है । प्रदेश के समस्त पत्रकार संगठनों नें मौन धारण किया हुआ है । मैनें भी दबी ज़बान से उसी चैनल में काम करने वाले मेरे एक मित्र से पूछा कि भाई...आख़िर माजरा क्या है??उसने भी बेबाकी से कहा की कोई भी समाचार बुनियाद के पत्थरों पर ही खड़ा होकर सामने आता है और यही हुआ भी है । दहशतगर्दी की ज़द में आये मीडिया को उसने सरफरोश बिस्मिल के शेर से हौसला दे दिया उसने बातों ही बातों में कहा कि ‘ वक़्त आने दे बता देंगे तूझे ए आसमाँ...हम अभी से क्या बतायें...क्या हमारे दिल में   है ‘ ....॥