Sunday, October 30, 2011

दीवाली का लिफाफा और जुगाड़


बतारिख़ 19 अक्टूबर शहर की एक सड़क पर एक पत्रकार (हमपेशेवर) मित्र से मुलाक़ात...हाथों के हाथों से मिलते ही उसने पूछा..."दीवाली का क्या जुगाड़ है?"...सवाल नया नहीं था मेरे लिये पर अब तक मैं इस जुगाड़ से महरूम रहा था लिहाज़ा साफगोयी से कह दिया "कुछ नहीं"...अगले ने तपाक से कहा "पागल है क्या?? मैं तेरी जगह होता तो लंबा हाथ मारता" इतना कह कर उसने विदा ले ली पर काफी देर तलक़ यह बात ज़हन में गूंजती रही की ऐसा क्या होता है पत्रकारों के लिये दीवाली पर जिसकी ख़ूब चर्चा होती है...?? काफी देर की दिमाग़िया मशक़्क़त के बाद मैनें फैसला किया की इस बार मामले की तह तक जाना ही है....बतारिख़ 22 अक्टूबर एक नवोदित पत्रकार संघ के अध्यक्ष महोदय से मुलाक़ात हुई...बावजूद जानते हुये की मैं उनके एंटी ग्रुप का एक सदस्य हूं उन्होनें कहा की "भाई तेरे नाम अधिकारियों को बता दिया हूं दीवाली के लिये...मिल लेना सबसे जाकर एक बार..." मैं मन ही मन शुक्रग़ुज़ार हुआ उस शख़्स के लिये जिसने कम से कम मुझे पूछ तो लिया...वरना मेरा पाला अब तक उन लोगों से  पड़ा था जिनके लिये जुगाड़ नामी शब्द सिर्फ स्वंय  तक सिमित रहा है....
दीपावली का दिन नज़दीक आते गया और हमारे शहर के क़लम के जादूगरों की सुगबुगाहट भी बढ़ती गयी...सरकारी दफ़्तरों में रोज़ाना हूजूम का हूजूम दिखायी दिये जा रहा था...मैनें भी अपने चंद हितैषी साथियों के साथ एक 'विज़िट' किया...चैनल का नाम और ओहदा देखकर कई ने कहा की आप तो बड़े ग्रुप से हैं...आप का तो विशेष ख़्याल रखना पड़ेगा.....प्रशासन के बड़े ओहदेदार अधिकारियों से यह सुन कर मन में उपजे दंभ को कंट्रोल करते हुये मैनें भी उनकी बातों पर अपनी मूक सहमति दे दी....... मेरे शहर में पत्रकार साथी कई धड़ों में बंटे हुये हैं..सबकी अपनी ढफली अपना राग...कई को तो मेरे एक नामी न्यूज़ चैनल से जुड़ने पर भी शक़ है...इससे सच कहूं तो मुझे कोई फर्क़ नहीं पड़ता पर सबसे ज़्यादा दुख तब हुआ जब मेरे चंद पूराने साथियों ने ही कई लोगों के सामनें मेरी विश्वसनीयता पर सवाल दाग़ना शुरू कर दिया.....जबकि उन्हें मेरे चैनल से जुड़े होने की पुख़्ता ख़बर थी...ये मेरे लिये एक बड़ा झटका था जिससे उबरना बेहद ज़रूरी था...कुछ दिनों की मानसिक उथल-पुथल के बाद मेरे दिमाग़ ने कहा "भाड़ में जाये"....फिर क्या मैनें इस मसले को यथार्थ के भाड़ में जाने देने का फैसला कर लिया....दीवाली का आने वाला त्योहार अपने पूरे शबाब में था...लोगों की दुकानों में बेदम भीड़ देखकर एक पल लगा की कौन कमबख़्त कहता है की महंगाई बढ़ गयी है...बाज़ार प्लास्टिक की थैलियों के कचरों से अटा पड़ा था जो जहां पाये वहां बिखरे हुये पर्यावरण विदों की नाक़ामी पर मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे....मैं बाज़ार की रोशनाई में खोया ही हुआ था की घर के नंबर से मेरा मोबाईल फोन घनघनाया..ट्रिन-ट्रिन...ट्रिन-ट्रिन....अगला स्वर हमारे साले साहब का था...उसने कहा की घर में कोई एक पैकेट छोड़ गया है और मिठाई का डिब्बा भी....कह रहा था की फलाँ विभाग से आया है कह देना....मैं तुरंत ही समझ गया की इस बार दीपावली की बोहनी हो ही गयी...
फिर सिलसिला शुरू हुआ....प्रशासन का कोई विभाग अछूता नहीं रहा जिसने लिफाफा संस्कृति को आत्मसात ना किया हो...रसूख़दारों के घर पर लिफाफे....दफ़्तरों में क़तार में लिफाफे बांटे जा रहे थे...जिसके लिये बाक़ायदा ज़िले के जन संम्पर्क विभाग से पंजीबद्ध पत्रकारों की सूची भी मंगायी गयी थी....कलेक्टोरेट के एक आला अफसर के दफ्तर की एक टेबल में जब ये लिफाफे सम्मानितों को दिये जा रहे थे तो वहीं एक अख़बार में अन्ना हज़ारे की तस्वीर दिखायी दी जो शायद यह सब देखकर अपना मुंह छुपाने की नाक़ाम कोशिश करती नज़र आ रही थी....मेरे दिमाग़ में यह बात बार-बार आ रही थी की दीवाली पर ये नेता/प्रशासनिक नुमाईंदे आख़िर किस बात के लिये नोटों से भरे लिफाफे बांट रहे हैं??रहा नहीं गया तो अपने एक दबंग पत्रकार साथी से पूछ ही लिया मैनें...की आख़िर इस माजरे की हक़ीक़त क्या है??उसने बड़ी बेबाक़ी से कहा की इनके भ्रष्ट्राचार के हज़ार मामले उजागर करने के बाद भी ये नहीं सुधरते...अब अकेला-अकेला "जिमना" कहां तक ठीक है...शायद यही सोच उन्हें यह करने को मजबूर करती होगी वरना ये तो दूसरे का कफन बेच कर भी खा जायें.......
बहरहाल लिफाफे की माया अपने चरम पर थी क्या मंत्री...क्या संत्री..संसद का प्रतिनिधित्व करने वालों ने भी स्थानीय नगर निगम के अपने एक मुरीद के माध्यम से लिफाफे बांटे...ये बात अलहदा थी की वो लिफाफे सिर्फ उस तक पहुंचे जहां सांसद कार्यालय के चाटुकारिताओं की सैटिंग थी...एन मौके पर मेरा नाम किसी क़रीबी पत्रकार के कहने पर काट दिये जाने की भी ख़बर लगी....राज्य के मुखिया की मिठाई स्वरूप लिफाफा भी शहर में आया जिसे बांटने की ज़िम्मेदारी किसी समय स्थानीय कृषि उपज मंडी की राजनीति से जुड़े और हाल में ही एक सोसायटी के चुनाव में बुरी तरह हारने वाले एक लंगड़ा कर चलने वाले महान व्यक्ति को सौंपी गयी...उस पर भी तबीयत से घाल-मेल किया गया...जिसको देना था उसी को दिया गया और बाकी को शायद यह कह दिया गया की उन्हें दीवाली की मिठाई खाने का अधिकार ही नहीं है....
जो कुछ भी इस दीवाली पर देखा वो मेरे लिये किसी बेहतरीन अनुभव से कम नहीं है...सिस्टम के साथ चलना शायद आज तरक्की का सिंबल बन चुका है..ऐसे कुत्सित समय में बदलाव की बात करना यक़ीनन बेमानी सा है....कभी-कभी मन में यह ख़्याल आता है कि क्या हम भी अन्ना के आंदोलन के वक़्त नई दिल्ली के रामलीला मैदान में उमड़ी उस उन्मादी भीड़ का हिस्सा हैं क्या जिनसे जन लोकपाल के बारे में पूछे जाने पर उन्हें इसकी कोई जानकारी नहीं थी....? भ्रष्ट्राचार के मुद्दे पर सारे देश ने जो हाल में ही एकजुटता दिखायी थी वो क़ाबिले तारिफ़ थी..सारी विपक्षी पार्टियों ने सत्ताधारी कांग्रेस की भद्द पीटने में कमी ना की थी..पर जनाब भ्रष्ट्राचार का अपने आप में एक आला दर्जा है...वो किसी पार्टी के बैनर का मोहताज नहीं...जब चाहे..जहां चाहे अपना वजूद स्थापित कर सकता है...समस्त ब्लॉगर मित्रों को दीप पर्व की ढेर सारी शुभकामनाओं के साथ....ये लिफाफा विहिन पोस्ट समर्पित है.....!!!!!

8 comments:

  1. bahut der se ye nazara dekha hai aapne.khair fir bhi taqdeer wale ho ki list me naam to aa hi gaya.wapas karna shuru kar doge to jugadu log aapka naam katwane me koi kasar nahi chhodenge.ye sab chalta rahega,tab taq jab taq humare beech gandi machhliyan hai,kai diwaliyan ho gayi aur kai loksabha-vidhan sabha chunaav bhi nipta diya,lifafa to aaj taq naseeb hi nahi hua,kyunki apni image hi thoda kharaab hai,aur yahan ke jugaduon ne aur badnaam kar rakha hai saahab kuchh bhi karo salaa gali hi deta hai.lifafa sanskriti se bachna hai to ek baar thoda kada kadam uthana padta hai uske baad mazal hai kisi ki himmat jo aapko lifafa dikhaye.wo to hum bazar me hai isiye har koi kimat lagane ki koshish karega hi,lekin jaise hi unhe pata chalega ye cheez bikaau nahi hai,ya ye cheez markhani hai to fir koi bhi himaat nahi karega.waise afsos hai is lafafa sanskriti ka chalan dhadalle se badh raha hai aur ye sirf aapke-humare chhote-manjhole shaharo taq nahi desh ke raajdhani me bhi saalo se chal raha hai.shayad neera radia wale mamle ne kuchh ko nanga kiya tha,kuchh bach gaye hai magar hua kya,channel badal gaye magar chehra wahi hai?tumhari chinta jayaj hai,magar shayad ye system ka hissa banta ja raha hai,kyunki patrkaar bhi samaj ka hi abhinn ang hai aur wo samaj ki buraiyon se bach nahi sakta.iska matlab ye nahi hai ki mai use jayaj thara raha hun.mai to bas itna kehna chahata hun,khud ko bacha le agar gandagi se to ye bhi kafi hai.subah-subah aaina dekhte samay khud se khud nazar na mila sako aise kaamo se bache,baki system to sala kaankhazoora hai tumhare-humare jaise ek-do taaang toot jane se bhi langda to hoga nahi.hahahahahaahhahahahahahahahahah

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  2. बेहतरीन..अनिल भैया शुक्रिया आपकी इस त्वरित टिप्पणी के लिये.....

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  3. bahut achhi baat batai aapne..par ye dukhad hai ki 4th piller of indian constitution ka haal ye hai..jin par corruption hatane ka jimma hai wahi khud "jugad" ki talaash me rehte hai...
    anyways good writing..
    waitng for nxt blog..

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  4. शुक्रिया स्वधा जी...कई के लिये ये दुर्भाग्य है तो कई के लिये परम सौभाग्य...जुगाड़ की माया अपरम्पार है...ज़रूरतें आख़िर सब की होती हैं फिर बिचारे पत्रकार इस लाभ से वंचित क्यों ना रहें??सिस्टम में बदलाव लाने के लिये इस देश को अभी कई हज़ार 'हजारे' की ज़रूरत हे.....आपकी टिप्पणी के लिये पुनः

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  5. @ जुगाड़ ,
    उस पार वालों ने लिफाफों का जुगाड़ किया और इस पार वालों ने पोस्ट का :)

    @ सिस्टम ,
    जब सारा मुल्क नंगई और भुखमरी वाली सोच का शिकार हो तो सिस्टम बदलने की उम्मीद करना बेमानी ही माना जायेगा :)

    @ दोस्त ,
    दोस्त वही जो नाम कटाये :)

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  6. वाह जनाब अली साहब पोस्ट के एक-एक शब्दों का अर्थ समझा दिया आपने...सुना था की एक अच्छे शिक्षक का अनुभव सागर की गहराईयों जैसा अनंत होता है...आज आपके टिपयाने के अंदाज़ ने इस बात को और मज़बूती दे दी...शुक्रिया आपका......

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  7. बेह्त्ररिन "पोस्ट" के लिए शुभकामनाएं .......
    साथ ही आपके शुभचिंतक बनकर आपके लिए दुआ करेंगे की ये कोई सरकारी आला अफसर न देख ले.......हह्हाआआआअ

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  8. शुक्रिया अर्चना जी..आप जैसे शुभ चिंतक साथ हों तो फिक्र बंद कमरों में छोड़ बेख़ौफ बाहर निकलता हूं...पोस्ट की भावनाओं को आपने समझा उसके लिये पुनः आपका धन्यवाद ....

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