Thursday, October 6, 2011

वक़्त ने किया..क्या हँसी सितम..तुम रहे ना तुम..हम रहे ना हम......


मुम्बई....पहले पहल नाम सुनते ही ज़हन में बस यही ख़्याल आता था की समुद्र का ख़ूबसूरत किनारा...सुपर स्टार अमिताभ बच्चन , शाहरूख़ ख़ान का घर ,आसमान चूमती ईमारतें और ना जाने क्या-क्या जिसे अपनी आँखों से देखना किसी हसीन सपने से कम ना हो.....फिर जैसे पिछले दो दशकों के दौरान आमची मुम्बई को किसी की नज़र सी लग गयी हो...दंगों का दावानल..माफिया से जुड़े लोगों की बैख़ौफ़ सरगर्मी...और जेहाद का छद्म आवरण ओढ़े आतंकवादी मुम्बई की सड़कों पर खुलेआम ख़ून की होली खेलते नज़र आये...तीन माह पहले श्रीमती ने मुम्बई दर्शन की ज़िद की तो मन में बेहद बुरे ख़्याल आने लगे पर सफर में साथ कुछ दोस्त भी थे सो हौसला अफ़ज़ाई हुई....अल्लाह के क़रम से मुम्बई का दर्शन ट्रेफिक की परेशानियों को छोड़ कर ईत्मीनान से पूरा हुआ...लौटते समय श्रीमती ने कहा की मुम्बई वैसी नहीं है जैसा की आप बोल रहे थे......? मैं एक पेशेवर पत्रकार हूं लिहाज़ा ख़बरों की दुनिया ने मुझे यक़ीनन हर मामलें में अलर्ट कर रखा है इसलिये मुम्बई जाने से पहले मेरी सोच ज़रूर कुछ अलहदा थी...फिलहाल मेरी यात्रा की सफलता ने मेरे सूकून में ईज़ाफ़ा कर दिया...हमारे लौटने के चंद दिनों बाद ही मुम्बई में दोबारा सिलसिलेवार बम विस्फोटों की ख़बर आयी...पता चला की जूहू के जिस किनारे पर हम मस्तियाते घूम रहे थे वहीं पर कहीं विस्फोट हुआ है...ख़बर ने एक बार फिर मन में सिहरन ला दी की कहीं उस दिन हम वहां होते तो क्या होता...??
मुझे सबसे ज़्यादा दुख इस बात का होता है की हम पहले ही मुम्बई जैसे शहर में भारत के बेहद मक्कार पड़ौसी मुल्कों की बदौलत आतंक का दंश झेल रहे हैं ऐसे में हमें जब अपनी बुनियाद को मज़बूत रखना चाहिये तो मुम्बई को जबरिया क्षेत्रियवादिता के दंगल में उतारा जा रहा है....मुम्बई में दबंगता की परिचायक पार्टी मनसे के एक प्रमुख ने एक नया शग़ुफ़ा छोड़ा की मुम्बई में सबसे ज़्यादा लोग ऊत्तर भारतीय ऑटो चालकों की मनमानी से त्रस्त हैं....बस क्या साहब ने बोला और पार्टी से जुड़े लोग बिचारे उन ग़रीब ऑटो चालकों पर टूट पड़े...इस पोस्ट के लिखे जाने से महज़ दो दिन पहले मनसे कार्यकर्ताओं नें ऊत्तर भारतीय ऑटो चालकों पर संघातिक हमले किये हैं..मुम्बई के वर्सोआ ईलाके में एक ऑटो चालक को इतनी बेरहमी से पीटा गया की अब वो अपने दोनों हाथ पैरों से ज़िंदगी भर लाचार रहेगा..मुम्बई के सायन,घाटकोपर,जूहू जैसे ईलाकों में भी उन ऑटो चालकों की फजीहत कर दी गयी वो भी सिर्फ इसलिये की वो ऊत्तर भारतीय हैं.....मुझे आज तक यह बात समझ में नहीं आयी की भारत पर क्या क्षेत्रवाद की सीमा में रह कर ही रहा जा सकता है..??दो वक़्त की रोटी के लिये अपना घर-बार छोड़ कर आये उन बेचारे ऑटों चालकों का क्या दोष रहा होगा...?? ईस्ट ईंडिया कंपनी के गवर्नर सर वारेन हिंगस्टीन ने आज से लगभग सौ साल पहले कहा था की "बंबई (मुम्बई)की ये खासियत है की यहां भारत के कोने-कोने से आये लोग एक साथ दिखायी दे जाते हैं जिनसे भारत के अदभुत कल्चर का नज़ारा एक ही जगह देखने को मिल जाता है" अब बताईये भी ज़रा....देश को लूटने आये लोग भी मुम्बई की तारीफ में फलसफा गढ़ के गये और हमारे कुछ लोगों को यह अपनापन रास नहीं आ रहा है...इस पोस्ट को लिखते वक़्त एफ.एम.रेडियो पर एक पूराना मधुर गीत बज रहा था..वक़्त ने किया..क्या हँसी सितम..तुम रहे ना तुम..हम रहे ना हम.....इस पोस्ट का इससे बेहतर टाईटल भला और क्या होगा..................!!!!

12 comments:

  1. आये थे तेरे शहर सोच के की कुछ काम करेंगे,
    पर यहाँ तो अपना नामो निशाँ ही न रह गया,,

    इन सबके लिए जितने और लोग जिम्मेदार है,उतने ही हम सब,हिन्हे ये सब की आदत हो चुकी है..............

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  2. koi aahat koi sada bhi nahi
    koi shahar me bacha hi nahi
    oonche mahlo kaa hal mat pocho
    hai sabhi kuchh magar hawa hi nahi..

    bahut khoob hai ye...unko aaina dikhata article hai jo mumbai ko apni jaageer samjhte hai

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  3. मुंबई जितना बडा शहर है उस मुकाबले वहां होने वाली ये घटना उतनी बडी नहीं है कि राष्‍ट्रीय मीडिया इसे दिन भर उछालते रहे...एक आटो चालक की पिटाई.... इस खबर को मीडिया चीख चीखकर बयां करती रही.. सरकार नाम की कोई चीज न होने का दावा करती रही...पर अफसोस छत्‍तीसगढ जैसे इलाकों में सुरक्षा बल के जवान तकरीबन हर दिन विस्‍फोट, गोलीबारी का शिकार हो रहे हैं और शहीद बनते जा रहे हैं....राष्‍ट्रीय मीडिया को इसे कव्‍हरेज करने की भी फुर्सत नहीं... किसी से सवाल पूछना तो दूर की बात है..... सब टीआरपी का चक्‍कर है....
    मुंबई में आतंकी हमले या दिल्‍ली पर आतंकी धमक देश की अस्मिता के लिए उतने ही खतरे हैं जितने कि इस देश के किसी छोटे से राज्‍य किसी छोटे से प्रदेश में हुए हादसे..... पर अफसोस.....

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  4. @ प्रिय अतुल जी ,
    हिंसा हर हाल में निंदनीय है ! लेकिन मुझे लगता है कि आपके द्वारा उल्लिखित दोनों हिंसा में कुछ मूलभूत अंतर है ! मिसाल के तौर पर ...

    (१) यहां दोनों पक्षों के पास असलहे मौजूद हैं ( फिर कौन किस पर भारी पड़ा यह अलग मुद्दा है ) पर वहां आटो चालक ?

    (२) यहां की हिंसा 'व्यवस्था' विरुद्ध 'अतिवाद' / 'लोकतंत्र' विरुद्ध 'माओवाद' है ! पर वहां हिंसा लठैत विरुद्ध जनसामान्य / राष्ट्रवाद विरुद्ध क्षेत्रीयतावाद की है !

    कुछ और भी लिखता पर आप खुद मीडिया वाले हैं कहीं मैं आपकी हिट लिस्ट में आ गया तो :)

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  5. @ अली शोएब सैयद साहब,
    ये फ़िक्र दुरुस्त है कि राष्ट्रवाद के सामने क्षेत्रीयतावाद एक भयंकरतम संकट है और ये भी कि संविधान की अनदेखी करने वालों के हौसले बुलंद हैं इन दिनों !
    लेकिन आशंका ये भी है कि मनसे ( मेरे लिए मनसे एक प्रवृत्ति है ) को कांग्रेसनीत सरकार का अंदरूनी समर्थन प्राप्त है ! अगर यह आशंका वाकई में सही हो तो फिर इस मुल्क और जनसाधारण का भगवान ही मालिक है !

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  6. @अली साहब आपने बिलकुल सही फरमाया। हिंसा हर हाल में निंदनीय है। शोएब जी के पोस्‍ट से मैं भी सहमत हूं और यह भी मानता हूं कि मौजूदा घटना क्षेत्रियतावाद बनान राष्‍ट्रतावाद की परिणति है... लेकिन मैंने अपनी बात व्‍यापक परिदृश्‍य में कही है। आपने ही कहा न हिंसा हर हाल में निंदनीय है तो हिंसा हर हाल में गलत होनी ही चाहिए.... इसमें भेद क्‍यों.....??? पर अफसोस....... मेरी अपनी ही बिरादरी इस पर भेद करने में लगी है। और इसकी जो वजह मुझे समझ आई वह थी टीआरपी का फंडा... सो इस पोस्‍ट में कमेंट के दौरान मेरी वो समझ हावी हो गई और मैंने इसे बयां कर दिया।
    आप लिखिए..... आपका मार्गदर्शन अपेक्षित रहेगा हमेशा.... अपनी करनी से मीडिया से खुद लोगों के हिट लिस्‍ट में है.....

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  7. शुक्रिया अर्चना जी....अली साहब...अतुल श्रीवास्तव जी

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  8. बहुत-बहुत शुक्रिया स्वधा जी आपके टिपयाने के लिये......

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  9. मेरे ही वतन में कोई शहर मेरा शहर नहीं ?
    यह कैसा शहर है जहाँ मेरा खुद का कोई घर नहीं ?
    मायूस लगे वाशिंदे भी , जैसे इनके अपने कोई दर नहीं !
    इस आबाद बस्ती में , मैं कहाँ हूँ , किसी से क्या कहूं ?
    एक भी परिचित शक्ल तक तो मुझे दिखती नहीं !
    कहने को तो जिन्दा हैं ' आदमी ' यहाँ वायदों और कायदों पर ,
    पर है कहीं न कहीं , बड़ी मजबूरियाँ , जो आँखे , फिर भी नम नहीं !!

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  10. ना जाने क्यू यहा इंसान ही घुल-मिल कर नहीं रहता ,
    .
    .
    .
    .

    वरना आजकल किस चीज़ मे मिलावट नहीं होती .??

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  11. अशोक पुरोहित जी...मुकेश नागपाल जी शुक्रिया आपके बेहतरीन कमेंट के लिये...

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  12. जहां हम रहते हैं वही सुरक्षित दर लगता है
    हमें अपना घर ही सबसे भावन यों लगता है
    होता यहां पर भी वही सब है, नहीं अलहदा
    मन कहां मानता है, खबर सही समझता है

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