Wednesday, September 21, 2011

कुत्ता और कविता........


मेरे घर का कुत्ता कवितायें लिखता है !!!!!!!
लिखता है , तुम आदमी/मैं कुत्ता
हम दोनों में चौपायों की विभिन्नतायें
मगर कितनी समानतायें
मैं मालिक देख कर दुम हिलाता
तू जनता देखकर
मैं खाना देखकर लार गिराता
तू ज़नाना देखकर
मैं काट खाकर चोट पहुंचाता
तू वोट खाकर
मैं लाचार होकर रोता
तू रिटायर होकर
मैं आहट से जाग जाता
तू घबराहट से
कविता के शब्द बढ़ते ही जा रहे थे
आदमी के बदन को कसते ही जा रहे थे
यह देख मैं अचानक चौंका
फिर ज़ोर से भौंका
बंद करो ये शब्दों के अस्त्र
अगर कुत्ते भी कवित्त लिखने लगे तो
आदमी के अस्तित्व और साहित्य के पर्यावरण का
भगवान ही मालिक है !!!!!!!!!!!!

7 comments:

  1. आदमी के लि‍ये ये शोचनीय बात है कि‍ बड़ी आसानी से उसकी तुलना कुत्‍ते से की जा सकती है...उसके गुणों से नहीं उसकी कमि‍यों से...


    जुर्म क्या? ये सजा क्यों है?

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  2. वो घर का कुत्ता ना होता तो इस कद्र हौसला ना करता बहरहाल इस मसले पर कवियों को ही फैसला लेना होगा कि किसकी कविता बेहतर है :)

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  3. अगर कुत्ते भी कवित्त लिखने लगे तो
    आदमी के अस्तित्व और साहित्य के पर्यावरण का
    भगवान ही मालिक है !!!!!!!!!!!!
    चिंतन योग्य :)

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  4. सच को प्रतिबिम्बित करती बेहतरीन रचना...

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  5. शुक्रिया राजे_शा जी,अली साहब,सुनील कुमार जी,डॉ. शरद सिंह जी...आपकी टिप्पणी सतत लेखन का बल देगी मुझे....

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  6. ...मन को झकझोरने के लिए बहुत सुन्दर भावमयी प्रस्तुति

    संजय भास्कर
    आदत....मुस्कुराने की
    पर आपका स्वागत है
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  7. शुक्रिया भास्कर साहब....

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