Tuesday, March 8, 2011

आदमी बनाम औरत


आदम को ईश्वर/अल्लाह/जीजस ने उत्पत्ति का पर्याय मान कर धरती पर भेजा है मौजुदा दौर में उसके हालात का पता कर पाना निहायत ही मुश्किल काम है ! यह पोस्ट मैं अपने एक बरसों पुरानें मित्र से मिलने के बाद उसकी रोज़ मरती ज़िन्दगी को देख लिख रहा हूँ...तक़रीबन गये हफ्ते ही एक शादी के सिलसिले में जयपुर (राजस्थान) जाना हुआ...मै बेहद खुश था कि शादी के दौरान अपने उस दोस्त से भी मुलाक़ात हो जायेगी जिसके साथ मेरे छोटे से ही सही मगर सांस्कृतिक रूप से समृद्ध नगर राजनांदगाँव में हमनें बचपन के बेहतरीन दिन ग़ुज़ारे थे...बचपन में वो शख्स बेहद चुलबुला सा था..शरारतें तो मानों उसकी नस-नस में भरी पड़ी थी..मेरे स्कूल के टीचर,सहपाठी,स्कूल की ही हॉकी टीम, सब के सब उसे देख कर ही रास्ता बदल लिया करते थे..स्कूल की लड़कियाँ अक्सर कहा करती थी.."दूर रहो उससे..वरना किसी दिन बुरे फंसोगे" मैं भी यह सब सुन तमाम बातों को दूसरे कान का रास्ता दिखा कर खत्म कर दिया करता था !
स्कूल की बॉयलाजी लैब में प्रेक्टिकल चल रहा था..सर ने एक दिन पहले ही चेता दिया था कि कल अर्थवर्म का डिसेक्शन करेंगे..इसलिये जहाँ मिले जैसा मिले अर्थवर्म (केंचुआ) पकड़ कर लाना...यह निहायत ही मुश्किल काम था पर उसने मुझे एक ख़ासा मोटा केंचुआ पकड़ कर दिया और कहा कि कल इसकी चीर-फाड़ की जवाबदारी तुम्हारी..मैनें पूछा और तुम्हारे लिये नहीं पकड़ा क्या? उसने कहा हो गया है बॉस डोंट वरी...अगले दिन लैब में सब अपने-अपने लाये केंचुये के साथ प्रेक्टिकल के लिये तैय्यार थे..मोम की प्लेट,डिसेक्शन बॉक्स सब रेडी था..सर ने कहा केंचुये को ध्यान से बाहर निकालो और पिन की मदद से मोम की प्लेट पर फिक्स कर दो..सब ने वही किया..तभी मेरे दोस्त के बगल में बैठी एक लड़की बदहवास सी लगभग चीखती हुयी बाहर निकली..एक पल को तो कुछ समझ नहीं आया पर मेरे दोस्त की मोम की प्लेट पर नज़र डाली तो सब समझ में आ गया..जनाब ने केंचुये की जगह एक ज़हरीले साँप के बच्चे को प्लेट पर लिटा रखा था...कुछ इस तरह उसके साथ बिता था मेरा बचपन और आज काफी सालों के बाद फिर से उस शख्स से मुलाक़ात के ख़्याल ने मेरी साँसों में बेचैनी ला दी थी....!
बहरहाल मैं अपनी शरीक़े हयात के साथ जयपुर पहुँच गया निकलने से पहले ही मैनें उसे फोन कर अपनी ट्रेन की पोजिशन/बोगी नं. सब की डिटेल बता दी थी...लिहाज़ा मैनें पत्नी जी को बोल रखा था कि देखना मेरे मना करने के बावजूद स्टेशन लेने आयेगा हमें...पर कुछ देर स्टेशन पर इंतेज़ार करने के बाद मेरा ख़्याल झूठा साबित हो गया और वो नहीं आया...शादी-शुदा मर्द बेहतर जानते हैं कि दूसरों के सामने भले ही उनकी जूतम-पैजार हो जाये पर पत्नी के सामने हुयी बेईज़्ज़ती बर्दाश्त नहीं होती...मैनें ख़ासी शर्म की चादर ओढ़ होटल का रूख़ किया...मैं जयपुर पहले भी कयी दफा आ चुका था..इसलिये शहर की अंजानियत मेरे आड़ नहीं आयी..वहाँ पहुँचने के पूरे दो दिन तक उसका कोयी फोन नहीं आया..मैनें सोचा या तो दोस्ती की अहमियत उसे पता नहीं या मेरा मोबाईल नं डिलिट हो गया होगा??मैं जिस शादी में शरीक़ होने गया था वो उस शख़्स के बेहद क़रीब के रिश्तेदार थे लिहाज़ा उसका शादी में आना तय था..उस शादी में मैं उसकी बेरूखी के चलते पूरी तरह मेहमान बनकर शामिल हुआ..शादी जयपुर के पॉश ईलाके मानसरोवर के एक बेहतरीन लॉन में थी...लॉन के बाहर पहुँचते ही मेरी धड़कनें थोड़ी तेज़ हो गयी कि अब तो उससे सामना हो ही जायेगा...तभी मैनें एक शख़्स को पीठ की ओर खड़े देखा जो किसी महिला से डाँट खा रहा था...मैं बेपरवाह भीतर की ओर जा रहा था कि पीछे से आवाज़ आयी "सॉरी यार...मैं तुझे लेने नहीं आ पाया" मैनें मुड़ कर देखा तो सामने वही शख्स खड़ा था जिसे मिनट मात्र पहले एक महिला गालियों से नवाज़ रही थी...ईत्तेफ़ाकन वही मेरे बचपन का दोस्त था...वो तेज़ी से मेरे पास आया और मुझसे लिपट कर बच्चों की तरह रोने लगा...मैनें आस-पास के लोगों को अपनी ओर घूरते देख उसे जैसे-तैसे सम्भाला और पत्नी को आगे बढ़ जाने का ईशारा करते हुये अपने दोस्त को लेकर थोड़े एकांत में आ गया..और सीधे पूछ बैठा कि क्या हुआ??कौन थी वो??उसने सुबकते हुये जो बताया उसे किसी पोस्ट में बयाँ करने की औक़ात शायद मुझमें नहीं है पर इतना कह सकता हूँ कि भारत अब पुरुष प्रधान देश हरगिज़ नहीं रहा है..मुझे इस बात का कोयी मलाल नहीं है...महिलाओं के प्रति सम्मानपूर्वक आज भी मेरा सर शिद्दत से झुकता है...पर ज़िन्दगी के तालाब की हर मछली ख़ूबसूरत हो ऐसा ज़रूरी तो नहीं है...मेरे दोस्त ने मुझे बताया कि वो पिछले पाँच सालों से ' पुरुष प्रताड़ना ' जैसे शब्द का शिकार है जिसके हिन्दुस्तानी क़ानून में कोयी माएने नहीं है...उसकी धर्मपत्नी उसे कयी दफे सरेआम पीट चुकी है...शरीर के कयी हिस्सों में तेज़ नाख़ूनों से खरोंचे जाने के निशान मौजुद हैं...मेरा दोस्त एक मल्टी नेशनल कम्पनी में अच्छी-खासी पोस्ट पर है..महीने के चालीस हज़ार कमा लेता है..घर पर एक मासूम बेटा भी है जो एक महंगे कॉनवेंट स्कूल का छात्र है...घर पर किसी चीज़ की कोयी कमी नहीं...फिर आखिर कौन सा कारण होगा इस प्रताड़ना का??यही सोच मैनें उससे साफगोयी से पूछा "कोयी दूसरी लड़की का चक्कर तो नहीं है??" उसने कहा कि "किसी से भी पूछ ले भाई अगर ऐसी-वैसी हरकत में मेरा नाम हो तो गर्दन काट देना मेरी"यह सुन मैं गहन चिंतन के अन्धकार में चला गया कि आखिर मेरी पुज्य भाभी के गुस्से की क्या वजह होगी??दूसरे दिन इसी यक्ष प्रश्न के दावानल में जलता हुआ मैं उसके घर पहुँचा तो देखा कि दरवाज़े के बाहर मेरे दोस्त का आठ साल का बेटा बेतहाशा रो रहा है...मैनें प्यार से उसके सर पर हाथ फिराते हुये पूछा कि क्या हुआ बेटा??उसने अपने सुर्ख लाल गालों में छपे उंगलियों के निशान दिखाते हुये कहा कि सायकल चलाते हुये गिर गया था तो मम्मी ने मारा...मुझे अब साफ तौर पर समझ में आ गया था कि ये समस्या अपने बस की नहीं है...पर किसी ना किसी को तो इसे सुलझाना ही पड़ेगा वरना बेवजह उपजे इस गुस्से के दाँव पर मेरे दोस्त जैसे कयी लोग निर्दोष होते भी चढ़ते ही रहेंगे...समानता का हक़/संसद में आरक्षण/सरकारी नौकरियों में तय स्थान की मांग करने और पाने वालों को इस ओर ध्यान देना भी लाज़िमी है...इतिहास गवाह है कि औरतों ने बलिदान की गाथाओं की ईबारत गढ़ी है...गिरते को उठना और रूकते को चलना सिखाया है...बद से बेहतरी के लिये, लिये जाने वाले हर ज़रूरी फैसले की समझ उनमें है..इसलिये उन्हें ही मेरे दोस्त जैसे लोगों की इस अबूझ समस्या का हल ढूंढना होगा..अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के इस शुभ अवसर पर इससे भला नेक काम और क्या हो सकता है...............!!

10 comments:

  1. यह भी हो सकता है ! दुनिया में हर तरह के लोग हैं ! पर यह पोस्ट शायद गलत दिन लग गई है !

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  2. अली साहब की बातों से सहमत।

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  3. आपका ये ब्लाग पढ़ कर हमारे अपने दिन याद आ गए ..!

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  4. Aurato ko Mardo se barabari nahi unse aage le jane ki jarurat hai,,,,,,par har baat ka exception hota hai,,,,,,,,,,Agar Ramayan main Sita Maa thi to Surprankha bhi wahi thi,,,,,,,,,,,hame surprakha ko kalyug main bhi sudharne ki jarurat hai,,,,,,,,uski naak katne ki jarurat hai

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    1. शुक्रिया संजय भैय्या....आदमी की फितरत अलग-अलग होती है...मौजुदा दौर में लिंग भेद कोई माएने नहीं रखता...आप ब्लॉग में आये उसके लिये धन्यवाद

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  5. bahut sahi baat ki hai Bhai aapne .....Koi bhi insaan bura ho sakta hai....ye zaroori nahi ki wo mard hi hoga maine khud kai aisi mahilaen dekhi hai jinhe dekhne k baad koi yakeen nahi kr paega ki aurat ka itna bhadda roop bhi ho sakta hai

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    1. shoaib ji aapke mitra ki isthiti jaan ke bahut dukh hua . sach mein aise kai case maine bhi dekhe hain jisme husband wife se torchure hote hain....mujhe iski do wajah samjh aati hai ek to yeh ki kuch ladke jarurat se jyada kuch chijo ko bardast karte hain.....shayad vo kisi baat se darte hain ya parivar ki badnami ka darr rehta hoga jiske karan yeh sab bardast karte hain.shayad aise purush mansik roop se thode kamjor hote hain aur kisi baat ka khul ke virodh karne ki kshamta nahi hoti unme. dusri wajah yeh ki jis mahila ke mayke mein maa dominating hoti hai aur maa ka interference sasural mein bhi barabar bana rehta hai voh is tarah ka behaviour karti hain....iska koi rasta nahi hai kyunki aisi aurato mein sudhar ki umeed karna hi galat hai.....agar jeevan mein sath rehna itna dushkar ho jaye to himmat karke alag hona jyada behtar hai...kyunki pehle kewal aapke dost aur shayad saas sasur ko us aurat ki pratarna jhelni padi hogi,fir unke bachche ko, aur aage unki bahu ko bhi yehi sab jhelna padega....isliye aisi aurat / ya aisa karne wale purush ko chhod dena hi behtar hai...yeh vichar aapke mitra ke man mein bhi aata hoga lekin voh parivar aur samaaj ke darr se aisa kuch karne ki himmat bhi nahi kar pa rahe honge...main janti hu...aapke mitra ke paas sukhad jeevan ka do hi vikalp hai...ya to khul ke apni wife ka virodh kare...aur unki galat baato ko bardasht na kare ya fir pyar se kanoonan alag ho jaye...agar yeh dono mein se kuch bhi karne ki himmat unme nahi to voh ek dukhi,jillat bhari jindagi jine ke hi hakdaar hain ....kyunki galat karna aur galat bardasht karna dono paap hai voh bhi tab jab aap galat ka virodh karne mein saksham hain....vo aurat jise itne saalo mein apne pati aur bachche ki kadr nahi ki vo aage bhi nahi karegi...aisi mahilaye/purush self concentrated hote hain jinke liye khud se jyada kuch bhi mahatavpurn nahi hota aur khud ke siwa vo kisi ko sahi nahi samjhte...shayad aap mere vicharo se sehmat na ho...lekin main apne anubhavo ke aadahr par hi apne vichar yahan rakh rahi hu...

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    2. @tripty सच कहा तृप्ति बुराई किसी में कोई फर्क नहीं देखती वो तो बस काबिज हो जाती है....चाहे वो मर्द हो या औरत.....शुक्रिया आपके कमेंट के लिये...
      @ पूजा जी आपके विचारों का सम्मान करता हूं यक़ीनन ग़लत कृत्य करना और सहना दोनो बातें नाकाबिले बर्दाश्त हैं...पर यह घटना एक ज़मीनी हक़ीक़त है जो यह बयां करती है कि मर्द और औरत एक सिक्के के दो पहलू हैं...इसलिये नारी अत्याचार के विरूद्ध मुहिम चलाने वाली महिला संगठनों को जबरिया अत्याचार का शिकार पुरूष वर्ग के लिये भी कुछ करना चाहिये..क्योंकि कानून ने हमेशा से ही नारी अत्याचार पर अपना फैसला सुनाया है जबकि अत्याचार झेल रहे पुरषों की सुनवाई भी नहीं होती........

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  6. ye dukhad sachhai hai apke mitr ki ..magar saari aurate aisi nahi hoti... unki samsya ka samadhaan unke hi paas hai kyoki wo unki betterhalf bhi hai...
    mai to mahilao k lie aisi baate sochna aur sun na bhi nahi chahti..thodi si selfish ho jati hu....
    bahut achhe vishay par apki post hai....vichaarniy

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    1. @स्वधा जी शत प्रतिशत आपकी बात से सहमत हूं कि ईंसानी फितरत एक जैसी नहीं होती और यह बात औरतों और मर्दो पर एक जैसी लागू होती है...फिर क्यों इस समाज में तनाव झेल रहे पुरषों को शक़ की नज़र से देखा जाता है??उनकी धर्मपत्नियां भले ही उनकी भद्द पीट रही हो पर समाज की नज़र में प्रथम दोषी उन्हें ही माना जाता है..इस जटिल समस्या का समाधान आप जैसी सुलझी हुई महिलाओं को ही निकालना होगा...आप लोगों का नज़रिया ना सिर्फ ऐसे मामलों में सटीक होगा बल्कि एक हद तक कारगर भी होगा...शुक्रिया आपके कमेंट के लिये....

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