Saturday, February 5, 2011

ये लाल रंग कब हमें छोड़ेगा....??


दहशतगर्दी का प्रशिक्षण
प्रकृति के अनेक रंगो में से एक लाल रंग...लाल रंग की तासीर भी अपने आप में निराली है...ढलते सूरज पर जो लालिमा चढ़ती है.. उसे निहारते मन नहीं भरता..गोरी-नारी स्त्री की मांग पर सजा लाल सिन्दूर उसके सौन्दर्य को चार चाँद लगा जाता है..लाल रंग में लिपटी मौली पवित्रता की निशानी मानी जाती है..माँ अपने बच्चे को प्यार से लाल कह कर बुलाती है..मसलन यह कह लीजिये कि यह वो रंग है जिसकी बदौलत आज हम और आप ज़िन्दा हैं...जो रंग हमारी धमनियों में बह रहा है उसी लाल रंग की बेचारगी देखिये जो आज छत्तीसगढ़ के वन बाहुल्य इलाकों में दहशत का प्रतीक बन चुका है...रोज़ाना किसी ना किसी की नक्सली हमले में मौत की ख़बर अख़बारों की सुर्खियाँ रहती हैं..इतिहास की मृत्यु और विचारधारा के अंत की साजिशों को बेनक़ाब करने की क़वायद में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से शुरू हुये इस आन्दोलन का चेहरा इतना वीभत्स हो चुका है कि कभी शोषण के विरूद्ध लाल रंग का दामन थाम चुके इस आन्दोलन के प्रणेता लोगों की मृतात्मा भी खून के आँसू रोती होगी...

हथियारों से खेलते मासूम
यकीन नहीं होता कि स्पार्टाकस , माओ ,चेग्वेरा की दुहाई देने वाले इन भटके हुये लोगों को रक्तपात करने में इतना मज़ा आता है कि पिछले एक वर्ष में ही अकेले छत्तीसगढ़ राज्य में ही 1400 से अधिक निर्दोष जानें इनके हाथों जा चुकी है...बूढ़े, बच्चे , जवान ! इनकी वहशियाना गोलियों ने किसी को नहीं बख़्शा...यात्री बसों में धमाके,निर्माण कार्यों में वाहनों को जबरिया फूँक देना,छोटे मासूम बच्चों के नन्हें हाथों में बन्दूकें थमा देना बहादुरी नहीं कोरी बेशर्मी है...किसी ज़माने में नक्सलवाद के मायने अलहदा थे..लेकिन आज नक्सलवाद जिस मुकाम पर खड़ा है उसे देख कर यह क़यास आसानी से लगाया जा सकता है कि यह आन्दोलन अपने उद्देश्य से कब का और पूरी तरह भटक चुका है..नक्सली मामलों में संलिप्तता के आरोप में पकड़े गये विनायक सेन मामले में सच और झूठ से जुड़ी हक़ीक़त तो स्याह पर्दे के पीछे छुपी हुई  है लेकिन जिस तरह से मानवाधिकार संगठनों नें विनायक सेन के समर्थन में अपनी हाजिरी दी है उसे देख कर तो यह लगता है अगर सेन वाकई नक्सली गतिविधियों में संलिप्त हैं तो यह दुर्भाग्य ही है कि मानव के मूलभूत अधिकारों के लिये लड़ने वाले लोगों नें अपने आप को शुतुरमुर्ग की श्रेणी का मान रखा है जो रेत में मुँह छुपा कर यह सोचता है कि कोई भी आफत उसे देख नहीं पा रही है !

नक्सली हमले का शिकार यात्री बस
नक्सलियों के कारनामों पर क़सीदे पढ़नें वालों में एक नाम अरून्धति राय ने तो एक तरह से क़लमकारों को शर्मसार ही कर दिया..उन्हें चाहिये था कि पहले वो नक्सल हमलों के दंश की चपेट में आये लोगों से मिलकर अपनी राय क़ायम करती पर अफसोस उन्होनें ऐसा किया नहीं ! मैं ठहरा अदना सा साहित्य प्रेमी अमूमन किसी समस्या को लेकर पोस्ट लिखा नहीं करता पर एक नक्सल प्रभावित ज़िले में पत्रकारिता करते हुये मैं नक्सली हमलों की ख़ौफनाक हक़ीक़त से वाबस्ता हूँ...मुख़बिरी के शक़ में बेरहमी से पीट-पीट कर मारे गये निर्दोष ग्रामीणों की लाशे देखने की हिम्मत जुटाने की अब आदत सी हो गयी है...पर हाल में ही पड़ौसी ज़िले नारायणपुर से नक्सलियों द्वारा अपहृत पुलिस के जवानों के परिवार की आँखों से बहते अविरल आँसू देखकर रहा नहीं गया और अंगुलियां कीबोर्ड पर इस उम्मीद के साथ चल पड़ी कि  "दुनिया में कितना ग़म है..मेरा ग़म कितना कम है" बहरहाल लाल रंग का ध्वज थामें चन्द लोग छत्तीसगढ़ की धरती को निर्दोषों के रक्त से रोज़ बदस्तूर लाल कर रहे हैं और उन्हें रोकने की कोशिश में कई माँओ के लाल तिरंगे में लपेटे जा रहे हैं... ये लाल रंग कब हमें छोड़ेगा....?



10 comments:

  1. बेहतरीन पोस्‍ट। सच में अब तो आदत हो गई है सडकों में बहते लाल खून को देखने की। मुझे याद है वह दिन जब हमारे क्षेत्र में नक्‍सलियों ने पुलिस पार्टी पर हमला किया था और उसमें कई परिवार उजड गए थे। और इसके बाद भी शायद ही कोई महीना, ये कहें कि कोई सप्‍ताह ऐसा बीतता है जब नक्‍सल हमले की खबरें नहीं आतीं। नक्‍सली अब सिर्फ पुलिस को निशाना नहीं बनाते, वे अब निर्दोष ग्रामीणों को भी बेरहमी से मारने लगे हैं।
    एक बडा सवाल खडा है कि ये लाल रंग कब हमें ?! अच्‍छी और विचारणीय पोस्‍ट। बधाई हो अली साहब, आपने इस मुददे को लिखा।

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  2. कुछ मुद्दों को हमारी खामोशी पसंद है ! इसलिए पोस्ट कंटेंट पर कोई कमेन्ट नहीं ! बहरहाल नया लेआउट अच्छा लगा :)
    लेखनी बेहतर है ! एक बार फिर से पढकर एडिट कर लें तो रवानगी आ जायेगी !

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  3. शुक्रिया अतुल जी सुधी पाठकों का कोलाज़ को हमेंशा से इंतेज़ार है और रहेगा..और पाठक आप जैसा हो अर्थात सोने पर सुहागा...तहेदिल से शुक्रिया जनाब अली साहब का जिन्होने मुझ जैसे नाचीज़ को ब्लॉगर बनाया है उनका हर हुक्म सर आँखो पर....

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  4. "लाल रंग का ध्वज थामें चन्द लोग छत्तीसगढ़ की धरती को निर्दोषों के रक्त से रोज़ बदस्तूर लाल कर रहे हैं और उन्हें रोकने की कोशिश में कई माँओ के लाल तिरंगे में लपेटे जा रहे हैं... ये लाल रंग कब हमें छोड़ेगा..."

    विचारनीय मुद्दा - पोस्ट अच्छी लगी

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  5. अत्यंत विचारणीय पोस्ट
    सार्थक लेखन
    बधाई
    आभार


    'सी.एम.ऑडियो क्विज़'
    हर रविवार प्रातः 10 बजे

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  6. यह बच्चों के प्रति एक घोर क्रूरता है.

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  7. समसामयिक पोस्ट. आभार.

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  8. लेखन अपने आप में ऐतिहासिक रचनात्मक कायर् है। आशा है कि आप इसे लगातार आगे बढाने को समपिर्त रहें। शानदार पेशकश।

    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
    सम्पादक-प्रेसपालिका (जयपुर से प्रकाशित हिंदी पाक्षिक)एवं
    राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
    0141-2222225 (सायं 7 सम 8 बजे)
    098285-02666

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  9. इस सुंदर से चिट्ठे के साथ आपका हिंदी ब्‍लॉग जगत में स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

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  10. वाकई, ये रक्तरंजित क्रांति बन्द होनी चाहिये ।
    http://najariya.blogspot.com/

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