Saturday, February 12, 2011

गिरते हैं शह सवार ही मैदान ए मोहब्बत में....


बात महज़ चन्द साल पुरानी है..यकीनन यह ऐक किस्सा है जिसने ऐक कहानी की शक्ल अख्तियार कर ली है..मेरे ग्रेजुऐशन के आख्रिरी साल के दौरान हमारे कालेज मे ऐक लड़की ने ऐडमिशन लिया जो सुरत और सीरत से काफी साधारण थी..इस लिहाज़ से मैने कभी उस पर तव्वजो नही दी..मै उन दिनों अक्सर ख्याली दुनिया मे खोया रहता था लिहाज़ा मोर्डन ख्यालात के लोगों को मै अपना करीबी मानता था..बावजूद इसके मेरी उस लड़की से जान पहचान हो गयी !
उन दिनों कालेज के ड्रामा ग्रुप मे मेरी तुती बोलती थी..हमने युथ फेस्टिवल की नाटक प्रतियोगिताओ मे काफी ईनामात हासिल किये थे..नाटको के मंचन के सिलसिले मे हमें अक्सर बाहरी शहरो की सैर करनी पडती थी..और मै सफर के दौरान अपने मूड के साथियो की तलाश मे रहता था..पर मेरी तलाश हमेंशा अधूरी रहती थी..वो लड़की अक्सर मेरी तन्हाई बांटने का काम किया करती थी..और मै पंछियो को फेंके गए चारे की तरह अपने चुगे जाने का इंतेज़ार किया करता था...इंतेज़ार के लम्हों ने तीन बरस की उमर तय कर ली..इस बीच कुछ ऐसा हुआ जिसने मेरी ज़िन्दगी के माऍने बदल दिये..लगने लगा कि जैसे पूरी क़ायनात मेरे खिलाफ हो गयी है..ऐसे समय में भी उसी लड़की   ने हर क़दम मेरा साथ दिया..पर मै उसे वो मुकाम अता नही कर पाया जिसकी वो हक़दार थी..अक्सर मै उससे बात-बात पर नाराज़ हो जाता था..और वह चुपचाप रह कर मुझे शर्मिन्दगी के पानी मे डुबा जाती थी..उसने ज़िन्दगी मे मुझसे कभी कुछ नही मांगा..साफगोई से कहता हूँ मैने कुछ दिया भी नहीं...उसने ख़ुदा से खुद के लिये कभी कुछ नहीं मांगा...पर कहते हैं कि अल्लाह इंसान की पैदाईश से पहले ही उसकी तमाम ज़िन्दगी के फैसले लिख चुका होता है..यक़ीनन ऐसा ही कुछ मेरे साथ होने वाला था ! सुना है वक़्त हर ज़ख़्म भर देता है..पर मेरे लिये वो शख़्स ना होता तो मेरा ज़ख्म कब का नासूर बन चुका होता...लेकिन इन सब एहसानात का बदला चुकाने के अलावा मैं बाक़ी सारी ग़ैर ज़रूरी चीज़ों को अंजाम देता रहा..

कहते हैं कि उम्दा इंसान वही है जिसे फैसला लेना आता हो..मसलन क्या सही ? और क्या ग़लत ? सोचा और राह पकड़ ली...पर साफगोई से कहुँगा की गोया अक्ल मरदूद ठिकाने पर थी ही नहीं मेरी...लड़कपन की परवाज़ सच की ज़मीन पर कहा लैंड होती है वो तो कटी पतंगो जैसी बलखाती रह्ती है..लेकिन जिसे ज़मीन के बिखरे धागो को समेटना नही आता उसे फलक के सपनो का कालीन बुनने का कोई हक़ नही होता..और मैं एक बावला बन कर बेराह ज़िन्दगी जिये जा रहा था..पर वक़्त ने मुझ पर मेहरबानी करने की सोच ली थी..आख़िरकार उसकी मासुमियत नें दो अलग-अलग मज़हब को मानने वाले परिवारों को भी हमराह कर दिया..मेरे घर से ही मेरे बड़े दूल्हे भाई साहब ने उसे देखकर कहा कि इसकी शादी क्यों नहीं करा देते गोलु (मेरे घर का नाम ) के साथ...?? बस फिर होना क्या था..जिसके साथ मैनें शायद दो क़दम भी चलने का नहीं सोचा था वो मेरे साथ ताज़िन्दगी चलने वाले रास्ते का हमसाया हो गयी...पर अफसोस सिर्फ इस बात का है कि जब मुझे उसे पहचानना था तब मैं उसे सिर्फ मददगार की हैसियत से देखता था यक़ीनन यही बात वह भी सोचा करती है..और कहीं ना कहीं इसका मलाल भी उसे है...इस पूरे वाक़ये से मैं इतना तो समझ गया कि इंसान अगर इरादा कर ले तो बड़ी से बड़ी चोट खाकर भी संभल सकता है..और मैनें तो फक़त किसी की बेवफाई से रूसवाईयाँ झेली हैं..बहरहाल गिरते हैं शह सवार ही मैदान ए मोहब्बत में...

Saturday, February 5, 2011

ये लाल रंग कब हमें छोड़ेगा....??


दहशतगर्दी का प्रशिक्षण
प्रकृति के अनेक रंगो में से एक लाल रंग...लाल रंग की तासीर भी अपने आप में निराली है...ढलते सूरज पर जो लालिमा चढ़ती है.. उसे निहारते मन नहीं भरता..गोरी-नारी स्त्री की मांग पर सजा लाल सिन्दूर उसके सौन्दर्य को चार चाँद लगा जाता है..लाल रंग में लिपटी मौली पवित्रता की निशानी मानी जाती है..माँ अपने बच्चे को प्यार से लाल कह कर बुलाती है..मसलन यह कह लीजिये कि यह वो रंग है जिसकी बदौलत आज हम और आप ज़िन्दा हैं...जो रंग हमारी धमनियों में बह रहा है उसी लाल रंग की बेचारगी देखिये जो आज छत्तीसगढ़ के वन बाहुल्य इलाकों में दहशत का प्रतीक बन चुका है...रोज़ाना किसी ना किसी की नक्सली हमले में मौत की ख़बर अख़बारों की सुर्खियाँ रहती हैं..इतिहास की मृत्यु और विचारधारा के अंत की साजिशों को बेनक़ाब करने की क़वायद में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से शुरू हुये इस आन्दोलन का चेहरा इतना वीभत्स हो चुका है कि कभी शोषण के विरूद्ध लाल रंग का दामन थाम चुके इस आन्दोलन के प्रणेता लोगों की मृतात्मा भी खून के आँसू रोती होगी...

हथियारों से खेलते मासूम
यकीन नहीं होता कि स्पार्टाकस , माओ ,चेग्वेरा की दुहाई देने वाले इन भटके हुये लोगों को रक्तपात करने में इतना मज़ा आता है कि पिछले एक वर्ष में ही अकेले छत्तीसगढ़ राज्य में ही 1400 से अधिक निर्दोष जानें इनके हाथों जा चुकी है...बूढ़े, बच्चे , जवान ! इनकी वहशियाना गोलियों ने किसी को नहीं बख़्शा...यात्री बसों में धमाके,निर्माण कार्यों में वाहनों को जबरिया फूँक देना,छोटे मासूम बच्चों के नन्हें हाथों में बन्दूकें थमा देना बहादुरी नहीं कोरी बेशर्मी है...किसी ज़माने में नक्सलवाद के मायने अलहदा थे..लेकिन आज नक्सलवाद जिस मुकाम पर खड़ा है उसे देख कर यह क़यास आसानी से लगाया जा सकता है कि यह आन्दोलन अपने उद्देश्य से कब का और पूरी तरह भटक चुका है..नक्सली मामलों में संलिप्तता के आरोप में पकड़े गये विनायक सेन मामले में सच और झूठ से जुड़ी हक़ीक़त तो स्याह पर्दे के पीछे छुपी हुई  है लेकिन जिस तरह से मानवाधिकार संगठनों नें विनायक सेन के समर्थन में अपनी हाजिरी दी है उसे देख कर तो यह लगता है अगर सेन वाकई नक्सली गतिविधियों में संलिप्त हैं तो यह दुर्भाग्य ही है कि मानव के मूलभूत अधिकारों के लिये लड़ने वाले लोगों नें अपने आप को शुतुरमुर्ग की श्रेणी का मान रखा है जो रेत में मुँह छुपा कर यह सोचता है कि कोई भी आफत उसे देख नहीं पा रही है !

नक्सली हमले का शिकार यात्री बस
नक्सलियों के कारनामों पर क़सीदे पढ़नें वालों में एक नाम अरून्धति राय ने तो एक तरह से क़लमकारों को शर्मसार ही कर दिया..उन्हें चाहिये था कि पहले वो नक्सल हमलों के दंश की चपेट में आये लोगों से मिलकर अपनी राय क़ायम करती पर अफसोस उन्होनें ऐसा किया नहीं ! मैं ठहरा अदना सा साहित्य प्रेमी अमूमन किसी समस्या को लेकर पोस्ट लिखा नहीं करता पर एक नक्सल प्रभावित ज़िले में पत्रकारिता करते हुये मैं नक्सली हमलों की ख़ौफनाक हक़ीक़त से वाबस्ता हूँ...मुख़बिरी के शक़ में बेरहमी से पीट-पीट कर मारे गये निर्दोष ग्रामीणों की लाशे देखने की हिम्मत जुटाने की अब आदत सी हो गयी है...पर हाल में ही पड़ौसी ज़िले नारायणपुर से नक्सलियों द्वारा अपहृत पुलिस के जवानों के परिवार की आँखों से बहते अविरल आँसू देखकर रहा नहीं गया और अंगुलियां कीबोर्ड पर इस उम्मीद के साथ चल पड़ी कि  "दुनिया में कितना ग़म है..मेरा ग़म कितना कम है" बहरहाल लाल रंग का ध्वज थामें चन्द लोग छत्तीसगढ़ की धरती को निर्दोषों के रक्त से रोज़ बदस्तूर लाल कर रहे हैं और उन्हें रोकने की कोशिश में कई माँओ के लाल तिरंगे में लपेटे जा रहे हैं... ये लाल रंग कब हमें छोड़ेगा....?