Saturday, January 22, 2011

'मैं' उदयपुर और नाटक



ठंड के मौसम की आहट के साथ माह नवम्बर की शुरुवात से मैं और मेरे दोस्त साल भर की गहरी सांस्कृतिक शिथिलता से यकायक जाग कर युवा महोत्सव की एकांकी नाटक विधा की तैय्यारी में जुट जाते हैं ! यकीनन अब ज़माने की तमाम मसरूफियत के भंवर में पड़ने के बाद मुझे और मेरे दोस्तों को इस महोत्सव का बेताबी से ईंतेज़ार रहता है ! बहरहाल हमनें तैय्यारी शुरु की ! युवा महोत्सव की प्रतियोगितायें भिन्न-भिन्न चरणों में होती हैं ! ज़िला स्तर,फिर राज्य और अंत में राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व का मौका मिलता है ! हमारी मेहनत रंग लायी और हमारा दल राष्ट्रीय युवा महोत्सव जो 12 जनवरी से 16 जनवरी के मध्य उदयपुर राजस्थान में आयोजित था के लिये हुआ !
                    लगभग दो माह हमनें ताबड़-तोड़ मेहनत की ! नाटक के लेखक होने की महती ज़िम्मेवारी के साथ-साथ मैं नाटक में एक अदना सा लेकिन महत्वपूर्ण पार्ट अदा कर रहा था ! नाटक के निर्देशक और मेरे अजीज़ दोस्त शरद श्रीवास्तव ने सभी मौसमी कलाकार साथियों से कड़ी मेहनत करायी ! फ़ाका-मस्ती के दिनों में नाटक की प्रापर्टी,कास्ट्युम के जुगाड़ में पसीने छूट जाते थे पर अब अल्लाह के फ़ज़लो क़रम से मैं और मेरी टीम के ज़्यादातर लोगों के हाथ पैसों के मामले में तंग नहीं है लिहाज़ा सब ने दिल खोल कर खर्च किया और नाटक पूरी स्टेज प्रापर्टी ,ब्रोशर , कास्ट्युम के साथ राष्ट्रीय स्तर पर मंचन के लिये तैय्यार था ! 5 जनवरी यानी मेरे जन्मदिन पर राज्य के आला खेल अधिकारी श्री विलियम लकड़ा ने फोन पर बताया कि राज्य का दल 9 जनवरी को उदयपुर के लिये रवाना होगा ! इस पुख़्ता जानकारी के बाद मैनें अपने जन्मदिन पर अमुमन हर साल होने वाली पार्टी का ख़्याल दिल से निकाला और रिहर्सल को फाईनल टच देने की क़वायद शुरु कर दी ! कहा जाता है कि सियासत की गन्दगी से आज के हालात के मद्देनज़र अगर कोयी बच पाया है तो वह केवल और केवल कलाधर्मी ही हैं...पर हमारी टीम के साथ कुछ ऐसा होने जा रहा था जो इस मिथक को तोड़ रंगमंच को सियासतदानों का अखाड़ा बना कर मंच परे रंजिश का भौंडा प्रदर्शन करने वाला था ! 6 जनवरी को बेग़म साहिबा का जन्मदिवस पड़ता है जो यकीनन खुद के जन्मदिन से भी ख़ास मौका है..उस बेहद ज़रुरी दिन को भी रिहर्सल के नाम कुर्बान कर दिया हालांकि ऐसा करना इसलिये मुमकिन हो चला कि हमारी बेग़म खुद नाटक का एक अहम हिस्सा थीं !
7 जनवरी को संचालनालय खेल एवँ युवा कल्याण पहुँचने पर पता चला की राज्य स्तर पर एकांकी नाटक विधा में अपनी हार से क्षुब्ध कुछ युवा साथियों ने हमारी टीम के एक सदस्य के खिलाफ सूचना के अधिकार क़ानून को जबरिया हथियार बना कर कुछ ऐसा कर दिया है जिससे कि हमारे दल की राष्ट्रीय स्तर की युवा महोत्सव प्रतियोगिता में भाग लेने की पात्रता ही समाप्त हो जाये ! हमारी टीम किसी भी हालत में राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व ना कर पाये इसकी कोशिश में साजिशों का दौर शुरु हो चला था...संचालनालय के बाहर अर्धनंग प्रदर्शन / ख़िलाफत के लिये प्रेस कांफ्रेंस / बड़े नेताओं का हस्तक्षेप इतना सब कुछ सुन कर एक पल तो ऐसा लगा की मानों पैरों तले ज़मीन ही खिसक गयी हो...इतने दिनों की शिद्दत भरी मेहनत बेहतरीन मंचीय प्रस्तुति की सारी कोशिशें एक पल में ही दूर होती दिखायी देने लगी...पर ख़ुदा को शायद कुछ और ही मंज़ूर था..आख़िरकार कुछ फ़िरकापरस्त लोगों की खिलाफत के बावजूद भी हम लोग उदयपुर के लिये रवाना हो गये ! राजस्थान की सरज़मीं इतिहास के फसाने बयाँ करती है...उदयपुर की ताज़ी हवाओं में महाराणा प्रताप का शौर्य घुला हुआ है जो जिस्म को हर वक़्त तरो-ताज़ा रखता है...नाटक की भारी स्टेज प्रापर्टी ढोते-ढोते निकले दम में उदयपुर के अद्भुत सौन्दर्य ने नयी जान फूँक दी...वहाँ पहुँचने के दूसरे दिन खेल अधिकारी श्री विलियम लकड़ा ने बेमन से ही सही पर नाटक की उठा-पटक को लेकर छत्तीसगढ़ में चल रही राजनिती का फरमान हमें सुना दिया जो गोया यूँ था कि हमारे दल को नाटक के मंचन करने पर पाबन्दी लगा दी गयी थी...सुन कर सच कहूँ तो इतना गुस्सा आया कि बवाल मचाने वाले सामने होते तो जूतों की बौछार कर देता...पर जो होना था वो हो गया...कला ने भी राजनैतिक बिसात के सामने घुटने टेक दिये....अब इस बेहतरीन आयोजन में हमारे पास करने को कुछ भी बाकी नहीं था...लिहाज़ा आस-पास के पूरे ईलाके के भ्रमण का फैसला लिया गया..फिर क्या था..माउंट आबू, चित्तोड़ ,अजमेर शरीफ,पुष्कर जहाँ समय मिला घूम आये...साथ गये मित्र अतुल श्रीवास्तव की एक ब्लागर मित्र डा.अजित गुप्ता जो ईत्तेफ़ाकन उदयपुर में ही रहतीं हैं से मिलने का मौका मिला...जो उदयपुर यात्रा का सबसे सुखद पहलु साबित हुआ...उन्होंने मुझे अपनी लिखी एक किताब भी भेंट की...बहरहाल मेवाड़ की कालजयी गौरवशाली परम्परा की साक्षी रही नगरी उदयपुर की यात्रा कभी ना भूलने वाली याद बन कर मन में समायी रहेगी !!

5 comments:

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  2. नाटक नहीं हुआ तो क्‍या हुआ पिक्‍चर अभी बाकी है मेरे दोस्‍त !

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  3. जिंदगी यूंही चलती है कुछ सहल कुछ दुश्वार सी ! वहां उदयपुर में कुछ ना हुआ पर यहां रायपुर में जो हुआ उसे भी नाटक माना जाये ! राज्याश्रित कलाओं के साथ अक्सर ऐसा ही होता है ! दरबार कब क्या कह बैठे / क्या कर डाले ?...उसका विवेक !

    आपकी बेगम साहिबा की बड़ी ननद साहिबा ६ जनवरी को हलाकान रहीं,मोबाइल कम्पनी को बद्दुआयें भी दीं जो फ़िज़ूल गईं,बात रिहर्सल की अब पता चली ! अब क्या किया जाये जो सीधी बात करने के शौक़ीन एसएमएस पे भरोसा नहीं करते :)

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  4. बीती ताहि बिसार दे, आगे अच्‍छे नाटक और उसके प्रदर्शन के लिए अभी से शुभकामनाएं.

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  5. शुक्रिया अली साहब..राहूल साहब यकीनन नाटक के लिये तगड़ी मेहनत की थी..इसलिये थोड़ा मलाल था जो ब्लॉग पर उतर गया...भाई अतुल को भी हौसला अफ़ज़ाई के लिये तहेदिल से शुक्रिया.....

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