Saturday, December 10, 2011

दहशत की ज़द में अब मीडिया भी.....


तारीख़ गवाह है कि भले ही मीडियाकर्मियों पर सैटिंग अथवा वसूली के आरोप-प्रत्यारोप लगते रहे हैं लेकिन समाज के इस कथित चौथे स्तंभ की सक्रियता से इस देश में हो रहा अरबों का भ्रष्ट्राचार थोड़ा ही सही पर कंट्रोल में है । यक़ीनन ये मीडिया ही है जिसकी वजह से राष्ट्र्मंडल खेलों में हुआ व्यापक भ्रष्ट्राचार उजागर हो सका । ये मीडिया की ताक़त ही है की संसद में पैसे लेकर सवाल पूछने वाले दुर्योधनों को राजनीत की महाभारत में शिकस्त झेलनी पड़ी । ये मिडिया ही है जिसमें भारत की सरकारों पर सर्वोच्य पदों पर आसीन व्यक्तियों का घिनौना चेहरा जनता को दिखलाने का भरपूर माद्दा है । मीडिया ने ही इस देश में अनाचारी आई.पी.एस. और भ्रष्ट्राचारी आई.ए.एस. अधिकारियों को बेनक़ाब करनें में अहम भूमिका निभाई है लेकिन यही मीडिया अपनी इसी बेबाकी की वजह से हमेशा ही राज्य तथा केन्द्रिय सरकार की आँख में कांटे की तरह चूभता रहता है ।
पिछले हफ्ते ही एक नये तथा तेज़ी से प्रसिद्ध हो रहे एक दैनिक अख़बार नें छत्तीसगढ़ में सरकार के काम-काज पर तल्ख़ क़लम चला कर सनसनी फैला दी  थी । इसी अख़बार ने हाल में ही मध्यप्रदेश में लीज़ पर गयी बेशकीमती खदानों के बारे में प्रदेश के मुखिया के उपर आरोपों की चंद बून्दे टपकाने का अदम्य साहस भी दिखाया और इस मामले में उसका साथ दिया मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के एक लोकप्रिय समाचार चैनल नें । निश्चित तौर पर यह बात प्रदेश की राजनीति की बागडोर संभाल रहे आकाओं को नाग़वार गुज़री और उन्होनें एक फरमान जारी कर उक्त समाचार चैनल का मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में जारी प्रसारण केबल ऑपरेटरों को निर्देशित कर बंद करा दिया । अब संभवतः अगली बारी उस समाचार पत्र की भी हो सकती है जिसे उक्त समाचार चैनल के प्रसारण पर रोक लगाकर एक तरह से सीधी चेतावनी दे दी गयी है । अब मीडियाकर्मियों को भी ज़िंदगी गुज़ारने के लिये ज़ाहिर तौर पर रोज़ी-रोटी की ज़रूरत पड़ती है लिहाज़ा बाक़ी सब  समझौते के अघोषित कागज़ों पर हस्ताक्षर कर दिये और सरकारी भौंपू की आवाज़ हमेशा की तरह बुलंदगी के मक़ाम तक पहुंचाने की क़वायद में भिड़ गये । रह गया तो उस समाचार चैनल का वह साहसी स्टॉफ जिसने वो कहने और करने का साहस किया जो सरकारी दहशत की ज़द में आये लोगों के पास नहीं था । इस मामले में अब तक कोई कुछ भी साफगोयी से खुलकर कहने को राजी नहीं है । हर तरह एक अजीब सी ख़ामोशी छायी हुई है । प्रदेश के समस्त पत्रकार संगठनों नें मौन धारण किया हुआ है । मैनें भी दबी ज़बान से उसी चैनल में काम करने वाले मेरे एक मित्र से पूछा कि भाई...आख़िर माजरा क्या है??उसने भी बेबाकी से कहा की कोई भी समाचार बुनियाद के पत्थरों पर ही खड़ा होकर सामने आता है और यही हुआ भी है । दहशतगर्दी की ज़द में आये मीडिया को उसने सरफरोश बिस्मिल के शेर से हौसला दे दिया उसने बातों ही बातों में कहा कि ‘ वक़्त आने दे बता देंगे तूझे ए आसमाँ...हम अभी से क्या बतायें...क्या हमारे दिल में   है ‘ ....॥

Tuesday, November 8, 2011

एक राजकीय पशु की निर्मम हत्या


मृत बॉयसन

हाल में ही एक वयस्क बाघिन की हत्या के मामले में आरोप झेल रहे राजनांदगाँव ज़िले के वन विभाग अमले के माथे अब एक राजकीय पशु वन भैसा (बॉयसन) की निर्मम हत्या का मूक दर्शक बने रहने का आरोप भी मढ़ गया है !बॉयसन की मौत ने एक बार फिर फारेस्ट विभाग के आला अफसरों की नींद काफूर कर दी है और अब वन महकमा कार्यवाही के भय के कारण पूरे प्रकरण को नयी कहानी देने के चक्कर में पड़ गया है !

बॉयसन के हमले से घायल महिला
 ज़िले के अम्बागढ़ चौकी विकास खंड की ग्राम पंचायत हाड़ीटोला के आश्रित ग्राम कहाड़कसा में 7 नवंबर की सुबह खेतों पर काम कर रही कुछ महिलाओं पर एक बॉयसन ने हमला कर दिया जिससे कारण दो महिलायें घायल भी हो गयी ! ग्रामीणों ने घायल गिरिजा बाई और निर्मला बाई को चौकी अस्पताल लाया जहां से उन्हें राजनांदगाँव  रिफर कर दिया गया ! इस घटना के बाद से उत्तेजित ग्रामीणों नें उक्त बॉयसन को लाठियों से पीट-पीट कर मार डाला हालांकि वन विभाग ने वन भैसे की ग्रामीणों द्वारा हत्या किये जाने की बात को सिरे से नकार दिया है तथा उक्त बॉयसन की मौत भूख-प्यास या किसी जहरीले पौधे खाने से होने की आशंका व्यक्त की है ! लेकिन मृत बॉयसन के शरीर पर संघातिक चोटों के निशान साफ तौर पर बयान कर रहे हैं की बॉयसन को बेरहमी से मारा गया है ! वन विभाग के अमले नें मामले को संदिग्ध देखते हुये आनन-फानन में देर शाम चौकी के समीपस्थ वन विभाग की सांगली रोपणी में उसका अंतिम संस्कार कर दिया ! वन विभाग के अमले का यह कृत्य पूरी तरह संदेह के दायरे में हैं वहीं विभाग की निरंतर नाकामियों के चलते लुप्त प्रायः हो रहे दुर्लभ जानवर ग्रामीणों के रोष का शिकार हो रहे हैं ! ग्रामीणों ने बताया की उन्होने वन विभाग को क्षेत्र में एक जंगली बॉयसन की मौजूदगी होने की पूर्व जानकारी दी थी पर विभाग का अमला मूक दर्शक बन कर तमाशा देखता रहा ! पोस्टमार्टम की रपट भी साफ कह रही है की बॉयसन की मौत संदिग्ध अवस्था में हुई है ! अब देखना यह है की प्रदेश के मुखिया डॉ.रमन सिंह जो की राजनांदगाँव के विधायक भी हैं इस पूरे मामले में क्या रूख़ क़ायम करते हैं बहरहाल एक राजकीय पशु की मौत नें फिर एक बार इन बेज़ुबान जानवरों की बदहाली भरी दास्तानों में ईजाफा कर दिया है !!!

Sunday, October 30, 2011

दीवाली का लिफाफा और जुगाड़


बतारिख़ 19 अक्टूबर शहर की एक सड़क पर एक पत्रकार (हमपेशेवर) मित्र से मुलाक़ात...हाथों के हाथों से मिलते ही उसने पूछा..."दीवाली का क्या जुगाड़ है?"...सवाल नया नहीं था मेरे लिये पर अब तक मैं इस जुगाड़ से महरूम रहा था लिहाज़ा साफगोयी से कह दिया "कुछ नहीं"...अगले ने तपाक से कहा "पागल है क्या?? मैं तेरी जगह होता तो लंबा हाथ मारता" इतना कह कर उसने विदा ले ली पर काफी देर तलक़ यह बात ज़हन में गूंजती रही की ऐसा क्या होता है पत्रकारों के लिये दीवाली पर जिसकी ख़ूब चर्चा होती है...?? काफी देर की दिमाग़िया मशक़्क़त के बाद मैनें फैसला किया की इस बार मामले की तह तक जाना ही है....बतारिख़ 22 अक्टूबर एक नवोदित पत्रकार संघ के अध्यक्ष महोदय से मुलाक़ात हुई...बावजूद जानते हुये की मैं उनके एंटी ग्रुप का एक सदस्य हूं उन्होनें कहा की "भाई तेरे नाम अधिकारियों को बता दिया हूं दीवाली के लिये...मिल लेना सबसे जाकर एक बार..." मैं मन ही मन शुक्रग़ुज़ार हुआ उस शख़्स के लिये जिसने कम से कम मुझे पूछ तो लिया...वरना मेरा पाला अब तक उन लोगों से  पड़ा था जिनके लिये जुगाड़ नामी शब्द सिर्फ स्वंय  तक सिमित रहा है....
दीपावली का दिन नज़दीक आते गया और हमारे शहर के क़लम के जादूगरों की सुगबुगाहट भी बढ़ती गयी...सरकारी दफ़्तरों में रोज़ाना हूजूम का हूजूम दिखायी दिये जा रहा था...मैनें भी अपने चंद हितैषी साथियों के साथ एक 'विज़िट' किया...चैनल का नाम और ओहदा देखकर कई ने कहा की आप तो बड़े ग्रुप से हैं...आप का तो विशेष ख़्याल रखना पड़ेगा.....प्रशासन के बड़े ओहदेदार अधिकारियों से यह सुन कर मन में उपजे दंभ को कंट्रोल करते हुये मैनें भी उनकी बातों पर अपनी मूक सहमति दे दी....... मेरे शहर में पत्रकार साथी कई धड़ों में बंटे हुये हैं..सबकी अपनी ढफली अपना राग...कई को तो मेरे एक नामी न्यूज़ चैनल से जुड़ने पर भी शक़ है...इससे सच कहूं तो मुझे कोई फर्क़ नहीं पड़ता पर सबसे ज़्यादा दुख तब हुआ जब मेरे चंद पूराने साथियों ने ही कई लोगों के सामनें मेरी विश्वसनीयता पर सवाल दाग़ना शुरू कर दिया.....जबकि उन्हें मेरे चैनल से जुड़े होने की पुख़्ता ख़बर थी...ये मेरे लिये एक बड़ा झटका था जिससे उबरना बेहद ज़रूरी था...कुछ दिनों की मानसिक उथल-पुथल के बाद मेरे दिमाग़ ने कहा "भाड़ में जाये"....फिर क्या मैनें इस मसले को यथार्थ के भाड़ में जाने देने का फैसला कर लिया....दीवाली का आने वाला त्योहार अपने पूरे शबाब में था...लोगों की दुकानों में बेदम भीड़ देखकर एक पल लगा की कौन कमबख़्त कहता है की महंगाई बढ़ गयी है...बाज़ार प्लास्टिक की थैलियों के कचरों से अटा पड़ा था जो जहां पाये वहां बिखरे हुये पर्यावरण विदों की नाक़ामी पर मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे....मैं बाज़ार की रोशनाई में खोया ही हुआ था की घर के नंबर से मेरा मोबाईल फोन घनघनाया..ट्रिन-ट्रिन...ट्रिन-ट्रिन....अगला स्वर हमारे साले साहब का था...उसने कहा की घर में कोई एक पैकेट छोड़ गया है और मिठाई का डिब्बा भी....कह रहा था की फलाँ विभाग से आया है कह देना....मैं तुरंत ही समझ गया की इस बार दीपावली की बोहनी हो ही गयी...
फिर सिलसिला शुरू हुआ....प्रशासन का कोई विभाग अछूता नहीं रहा जिसने लिफाफा संस्कृति को आत्मसात ना किया हो...रसूख़दारों के घर पर लिफाफे....दफ़्तरों में क़तार में लिफाफे बांटे जा रहे थे...जिसके लिये बाक़ायदा ज़िले के जन संम्पर्क विभाग से पंजीबद्ध पत्रकारों की सूची भी मंगायी गयी थी....कलेक्टोरेट के एक आला अफसर के दफ्तर की एक टेबल में जब ये लिफाफे सम्मानितों को दिये जा रहे थे तो वहीं एक अख़बार में अन्ना हज़ारे की तस्वीर दिखायी दी जो शायद यह सब देखकर अपना मुंह छुपाने की नाक़ाम कोशिश करती नज़र आ रही थी....मेरे दिमाग़ में यह बात बार-बार आ रही थी की दीवाली पर ये नेता/प्रशासनिक नुमाईंदे आख़िर किस बात के लिये नोटों से भरे लिफाफे बांट रहे हैं??रहा नहीं गया तो अपने एक दबंग पत्रकार साथी से पूछ ही लिया मैनें...की आख़िर इस माजरे की हक़ीक़त क्या है??उसने बड़ी बेबाक़ी से कहा की इनके भ्रष्ट्राचार के हज़ार मामले उजागर करने के बाद भी ये नहीं सुधरते...अब अकेला-अकेला "जिमना" कहां तक ठीक है...शायद यही सोच उन्हें यह करने को मजबूर करती होगी वरना ये तो दूसरे का कफन बेच कर भी खा जायें.......
बहरहाल लिफाफे की माया अपने चरम पर थी क्या मंत्री...क्या संत्री..संसद का प्रतिनिधित्व करने वालों ने भी स्थानीय नगर निगम के अपने एक मुरीद के माध्यम से लिफाफे बांटे...ये बात अलहदा थी की वो लिफाफे सिर्फ उस तक पहुंचे जहां सांसद कार्यालय के चाटुकारिताओं की सैटिंग थी...एन मौके पर मेरा नाम किसी क़रीबी पत्रकार के कहने पर काट दिये जाने की भी ख़बर लगी....राज्य के मुखिया की मिठाई स्वरूप लिफाफा भी शहर में आया जिसे बांटने की ज़िम्मेदारी किसी समय स्थानीय कृषि उपज मंडी की राजनीति से जुड़े और हाल में ही एक सोसायटी के चुनाव में बुरी तरह हारने वाले एक लंगड़ा कर चलने वाले महान व्यक्ति को सौंपी गयी...उस पर भी तबीयत से घाल-मेल किया गया...जिसको देना था उसी को दिया गया और बाकी को शायद यह कह दिया गया की उन्हें दीवाली की मिठाई खाने का अधिकार ही नहीं है....
जो कुछ भी इस दीवाली पर देखा वो मेरे लिये किसी बेहतरीन अनुभव से कम नहीं है...सिस्टम के साथ चलना शायद आज तरक्की का सिंबल बन चुका है..ऐसे कुत्सित समय में बदलाव की बात करना यक़ीनन बेमानी सा है....कभी-कभी मन में यह ख़्याल आता है कि क्या हम भी अन्ना के आंदोलन के वक़्त नई दिल्ली के रामलीला मैदान में उमड़ी उस उन्मादी भीड़ का हिस्सा हैं क्या जिनसे जन लोकपाल के बारे में पूछे जाने पर उन्हें इसकी कोई जानकारी नहीं थी....? भ्रष्ट्राचार के मुद्दे पर सारे देश ने जो हाल में ही एकजुटता दिखायी थी वो क़ाबिले तारिफ़ थी..सारी विपक्षी पार्टियों ने सत्ताधारी कांग्रेस की भद्द पीटने में कमी ना की थी..पर जनाब भ्रष्ट्राचार का अपने आप में एक आला दर्जा है...वो किसी पार्टी के बैनर का मोहताज नहीं...जब चाहे..जहां चाहे अपना वजूद स्थापित कर सकता है...समस्त ब्लॉगर मित्रों को दीप पर्व की ढेर सारी शुभकामनाओं के साथ....ये लिफाफा विहिन पोस्ट समर्पित है.....!!!!!

Thursday, October 6, 2011

वक़्त ने किया..क्या हँसी सितम..तुम रहे ना तुम..हम रहे ना हम......


मुम्बई....पहले पहल नाम सुनते ही ज़हन में बस यही ख़्याल आता था की समुद्र का ख़ूबसूरत किनारा...सुपर स्टार अमिताभ बच्चन , शाहरूख़ ख़ान का घर ,आसमान चूमती ईमारतें और ना जाने क्या-क्या जिसे अपनी आँखों से देखना किसी हसीन सपने से कम ना हो.....फिर जैसे पिछले दो दशकों के दौरान आमची मुम्बई को किसी की नज़र सी लग गयी हो...दंगों का दावानल..माफिया से जुड़े लोगों की बैख़ौफ़ सरगर्मी...और जेहाद का छद्म आवरण ओढ़े आतंकवादी मुम्बई की सड़कों पर खुलेआम ख़ून की होली खेलते नज़र आये...तीन माह पहले श्रीमती ने मुम्बई दर्शन की ज़िद की तो मन में बेहद बुरे ख़्याल आने लगे पर सफर में साथ कुछ दोस्त भी थे सो हौसला अफ़ज़ाई हुई....अल्लाह के क़रम से मुम्बई का दर्शन ट्रेफिक की परेशानियों को छोड़ कर ईत्मीनान से पूरा हुआ...लौटते समय श्रीमती ने कहा की मुम्बई वैसी नहीं है जैसा की आप बोल रहे थे......? मैं एक पेशेवर पत्रकार हूं लिहाज़ा ख़बरों की दुनिया ने मुझे यक़ीनन हर मामलें में अलर्ट कर रखा है इसलिये मुम्बई जाने से पहले मेरी सोच ज़रूर कुछ अलहदा थी...फिलहाल मेरी यात्रा की सफलता ने मेरे सूकून में ईज़ाफ़ा कर दिया...हमारे लौटने के चंद दिनों बाद ही मुम्बई में दोबारा सिलसिलेवार बम विस्फोटों की ख़बर आयी...पता चला की जूहू के जिस किनारे पर हम मस्तियाते घूम रहे थे वहीं पर कहीं विस्फोट हुआ है...ख़बर ने एक बार फिर मन में सिहरन ला दी की कहीं उस दिन हम वहां होते तो क्या होता...??
मुझे सबसे ज़्यादा दुख इस बात का होता है की हम पहले ही मुम्बई जैसे शहर में भारत के बेहद मक्कार पड़ौसी मुल्कों की बदौलत आतंक का दंश झेल रहे हैं ऐसे में हमें जब अपनी बुनियाद को मज़बूत रखना चाहिये तो मुम्बई को जबरिया क्षेत्रियवादिता के दंगल में उतारा जा रहा है....मुम्बई में दबंगता की परिचायक पार्टी मनसे के एक प्रमुख ने एक नया शग़ुफ़ा छोड़ा की मुम्बई में सबसे ज़्यादा लोग ऊत्तर भारतीय ऑटो चालकों की मनमानी से त्रस्त हैं....बस क्या साहब ने बोला और पार्टी से जुड़े लोग बिचारे उन ग़रीब ऑटो चालकों पर टूट पड़े...इस पोस्ट के लिखे जाने से महज़ दो दिन पहले मनसे कार्यकर्ताओं नें ऊत्तर भारतीय ऑटो चालकों पर संघातिक हमले किये हैं..मुम्बई के वर्सोआ ईलाके में एक ऑटो चालक को इतनी बेरहमी से पीटा गया की अब वो अपने दोनों हाथ पैरों से ज़िंदगी भर लाचार रहेगा..मुम्बई के सायन,घाटकोपर,जूहू जैसे ईलाकों में भी उन ऑटो चालकों की फजीहत कर दी गयी वो भी सिर्फ इसलिये की वो ऊत्तर भारतीय हैं.....मुझे आज तक यह बात समझ में नहीं आयी की भारत पर क्या क्षेत्रवाद की सीमा में रह कर ही रहा जा सकता है..??दो वक़्त की रोटी के लिये अपना घर-बार छोड़ कर आये उन बेचारे ऑटों चालकों का क्या दोष रहा होगा...?? ईस्ट ईंडिया कंपनी के गवर्नर सर वारेन हिंगस्टीन ने आज से लगभग सौ साल पहले कहा था की "बंबई (मुम्बई)की ये खासियत है की यहां भारत के कोने-कोने से आये लोग एक साथ दिखायी दे जाते हैं जिनसे भारत के अदभुत कल्चर का नज़ारा एक ही जगह देखने को मिल जाता है" अब बताईये भी ज़रा....देश को लूटने आये लोग भी मुम्बई की तारीफ में फलसफा गढ़ के गये और हमारे कुछ लोगों को यह अपनापन रास नहीं आ रहा है...इस पोस्ट को लिखते वक़्त एफ.एम.रेडियो पर एक पूराना मधुर गीत बज रहा था..वक़्त ने किया..क्या हँसी सितम..तुम रहे ना तुम..हम रहे ना हम.....इस पोस्ट का इससे बेहतर टाईटल भला और क्या होगा..................!!!!

Monday, September 26, 2011

आज का अख़बार.....


रोज़ सुबह / सहमें हुये / दरवाज़े पर
दस्तक देता है अख़बार
सतरंगी आवरण / अमानुषी नगर दर्पण
कहीं-कहीं बिखरी हुई लाशें / और कहीं बलात्कार
संपादक् महोदय कहते / विज्ञापनों का 'रेट' चढ़ रहा है
असमायिक मृत्यु का समाचार/नित नये दिन बढ़ रहा है
श्रीमती ढूंढ रही पन्नों में / तरीका नये अचार का
पर दिखायी दे रहा सलीका/चोटों के प्राथमिक उपचार का
झांक रहा कोनें में / समाचार राज्य स्तरीय खेल का
दिया हुआ है विस्तृत विवरण/दुर्घटनाग्रस्त राजधानी मेल का
ग़रीबों के राशन की अफरा-तफरी / नेताओं के मन का खोट
आगरा/दिल्ली/मुंम्बई में फिर हुआ आज विस्फ़ोट
अत्याचार / व्याभिचार / भ्रष्ट्राचार
भर गया ईन्ही ख़बरों से / पूरा आज अख़बार
लिखावट के रंगों पर अगर ध्यान ना दिया जाये तो.....
पढ़ते वक़्त पूरा " लाल " नज़र आता है आज का अख़बार !!!!!!!

Wednesday, September 21, 2011

कुत्ता और कविता........


मेरे घर का कुत्ता कवितायें लिखता है !!!!!!!
लिखता है , तुम आदमी/मैं कुत्ता
हम दोनों में चौपायों की विभिन्नतायें
मगर कितनी समानतायें
मैं मालिक देख कर दुम हिलाता
तू जनता देखकर
मैं खाना देखकर लार गिराता
तू ज़नाना देखकर
मैं काट खाकर चोट पहुंचाता
तू वोट खाकर
मैं लाचार होकर रोता
तू रिटायर होकर
मैं आहट से जाग जाता
तू घबराहट से
कविता के शब्द बढ़ते ही जा रहे थे
आदमी के बदन को कसते ही जा रहे थे
यह देख मैं अचानक चौंका
फिर ज़ोर से भौंका
बंद करो ये शब्दों के अस्त्र
अगर कुत्ते भी कवित्त लिखने लगे तो
आदमी के अस्तित्व और साहित्य के पर्यावरण का
भगवान ही मालिक है !!!!!!!!!!!!

Thursday, June 2, 2011

वो ईक दिन भूखे रहते हैं तो हंगामा हो जाता है..और कोई जब भूख से मरता है तो आवाज़ नहीं आती.....


बात कहने की नहीं ज़ाहिर है कि एयर कंडीशन कारों में घूमने वाले,एयर कूल आरामगाहों में रहनें वाले समाज सेवी बनाम समाज के कर्ता-धर्ता आजकल एक नया शौक पाल रहे हैं जिसका नाम है 'अनशन'... वैसे ये नाम भारतीयों के ज़हन में कोई नया नहीं है...आज से तक़रीबन 95 साल पहले हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने यह फार्मूला सुझाया था...जो तब से लेकर आज तक सुपर हिट रहा है...भारत का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि इस देश में आज़ादी से पहले से लेकर आज तक एक निहायत ही बेतुका क्रेडिट गेम चलता है...आज़ादी से पहले शहीदे आज़म भगत सिंह , सुखदेव , राजगुरू , चन्द्र शेखर आज़ाद जैसे मतवालों ने अंग्रेज़ी हूक़ुमत के शरीर को छलनी-छलनी कर दिया था...वो उनके जज़्बों के आगे टूट चुके थे...गोली का जवाब गोली से देनें वाले वीरों को फाँसी दे दी गयी...और कुछ देश प्रेमी मौन साध कर बैठ गये...कुछ ने फाँसी के विरोध में वही "अनशन" का फार्मुला अपना कर अपने कर्तव्यों की ईतिश्री कर ली और कुछ ने चन्द आँसु बहा कर अपने आप को दिलासा दे दिया....पर देश ने इन महान क्रांतिकारियों को इसी दो मुंहे पन की बदौलत खो दिया...महान शहीद सुखदेव ने अपने एक पत्र में लिखा था कि सच पूछो तो ब्रिटिश सरकार हमें फाँसी नहीं लगा रही है..हमारा गला तो हमारे  सो काल्ड लीडर्स ही दबा रहे हैं...शहीद अशफाक उल्ला ख़ान ने भी जनविरोधी नेताओं के लिये एक गज़ल गायी थी जिसका एक प्रसिद्ध मिसरा था कि 'सुनायें गम की किसको कहानी..हमें तो अपने सता रहे हैं'....
            माफ किजियेगा मैं भी जज़बाती होकर क्या-क्या लिखे जा रहा हूं...पर क्या करूं शहीदे आज़म भगत सिंह का नाम सुनते ही नसों में बहने वाले ख़ून में उबाल आ जाता है और लगता है कि यदि हाथों में कम्प्यूटर की की बोर्ड की जगह तलवार होती तो आज तरक्की के नाम पर हमारे चेहरों पर कालिख़ पोतने वालों की ख़ैर नहीं होती....हाल में ही आम तौर पर राजनितिक पार्टियों से दूरी रखने वाले समाज सेवी श्री अन्ना हज़ारे ने लोकपाल विधेयक के समर्थन में अनशन किया तो ख़्याल आया कि चलो कई दिनों बाद कोई ऐसा मुद्दा सामने आया है जिसे समर्थन दिया जा सकता है...इस देश के युवाओं ने भी हाईटेक केम्पेन चला कर हज़ारे जी को पूर्ण समर्थन दिया....सरकार ने भी दबाव में आकर विधेयक को कुछ शर्तों के साथ मंजूरी दे दी...लेकिन फिर वही हुआ जो इस देश में अमूमन अब तक होता आया है..श्री अन्ना हज़ारे द्वारा प्रतावित लोकपाल कमेटी के सदस्यों की भ्रष्ट्राचार में लिप्त होने की ख़बरे मिडिया में आयीं और अन्ना जी के इस अथक प्रयास की मट्टी-पलीद हो गयी....और अब 4 जून से भारत के योग गूरू बाबा रामदेव भी अनशन के इसी सुपर हिट फार्मुले पर हाथ अज़माने उतर रहे हैं...हज़ारे जी तो सादगी पसन्द आदमी है लिहाज़ा उनका अनशन बेहद सादगी के साथ चला और एक हद तक सफल भी रहा पर स्कॉटलैंड में एक आलीशान द्वीप के मालिक बाबा रामदेव अपने लाव-लश्कर के साथ 2.5 लाख वर्ग फीट के आलीशान पंडाल में 1000 वर्ग फीट के एयर कंडीशन टेंट में अस्पताल और सी.सी.टी.वी. जैसी सम्पूर्ण सुविधाओं के साथ अनशन में बैठेंगे....बाबा रामदेव का कहना है कि उनका अनशन बनाम आंदोलन सत्ता के लिये नहीं वरन व्यवस्था परिवर्तन के लिये है...खैर जो भी हो हाल में ही छत्तीसगढ़ के धर्मजयगढ़ ईलाके के एक परिवार जिसमें माता और पिता,एक मासूम को मिलाकर तीन लोगों ने भूख से तड़प कर अपनी जान गवाँ दी...पर इस पूरे मामले को लीपा-पोती कर दबा दिया गया..कहीं किसी को कोई ख़बर नहीं पहुंचने दी गयी....आम जनता की छाती पर बैठ कर विलासिता का जीवन जी रहे बड़े लोग जब किसी मुद्दे को लेकर एक दिन भी भूखे रहते हैं तो हंगामा मच जाता है...और उधर कोई जब भूख से मरता है तो आवाज़ तक नहीं आती....आख़िर कब तक चलेगा यह सब...कब तक.......!!!!

Thursday, May 26, 2011

ख़ुशियों से लबरेज़ लम्हों में दर्द के अफसाने भी हैं....


कहा जाता है कि खुशी अकसर दर्द की हदों से ग़ुज़र कर आती है..या गोया ये कह लिजिये की दर्द के सिलसिले जहाँ ख़त्म होते हैं उसी जगह से ख़ुशी की शुरुवात होती है...मेरी शरीक़े हयात राजनांदगाँव ज़िले की डोंगरगढ़ तहसील स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में कार्यरत है...डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध धर्म नगरी के रूप में विख्यात है लिहाज़ा वहाँ काफ़ी लोगों का आना-जाना होता है...अब अस्पताल है तो मरीज़ भी बहुतायत आयेंगे....एक दिन काम से लौट कर उसने एक वाकया बताया जो इस पोस्ट की शक़्ल में आपके सामने है.... डोंगरगढ़ का अस्पताल अपेक्षाकृत काफी छोटा है...अस्पताल का डिलीवरी रूम भी इसी मर्ज़ का शिकार है...छत्तीसगढ़ के अन्दरूनी ईलाको में पहले से ही स्वास्थ्य कर्मचारियों का टोटा है जिसके चलते ज़ियादातर प्रसव अस्पतालों में एक के बाद एक ही किया जाता है...
पर उस दिन डोंगरगढ़ के अस्पताल में प्रसव वेदना से तड़पती दो महिलाओं को एक साथ लाया गया था...दोनों महिलाओं के परिजन जल्द ही नये मेहमानों को देखने के लिये व्याकुल हुये जा रहे थे...मेरी श्रीमती अस्पताल के अपने बने चेम्बर में खाली बैठी थी कि नर्स ने उससे कहा "भारती खाली हो तो ज़रा डिलीवरी रूम में चलो..थोड़ी मदद कर दो" यह सुन वह डिलीवरी रूम की तरफ रवाना हो गयी...दरवाज़े पर ही दोनों महिलाओं के परिजनों ने उम्मीद भरी नज़रों से उसे देखा...अन्दर दोनों महिलाओं की पीड़ा अपने चरम पर थी और अस्पताल के डॉक्टर व अन्य स्टॉफ डिलीवरी की अंतिम प्रक्रिया पूर्ण करने की तैय्यारी में जुटे थे...तभी डॉ.साहब ने मेरी श्रीमती को किसी ज़रूरी चीज़ स्टोर रूम से लाने को कहा...बाहर निकलते ही महिलाओं के परिजनों नें उससे पूछा क्या हुआ...? उसने उन्हें धीरज रखने की बात कही और वह स्टोर रूम की ओर रवाना हो गयी...वापसी में उन्हीं में से एक परिजन ने उससे कहा कि "हम 8 सालों से इस पल का ईंतेज़ार कर रहे हैं भगवान ने अब जाकर यह् खुशी दी है..ज़रा ध्यान रखना"...तभी दूसरी महिला के परिजन नें कहा कि "पहली औलाद है हमारे खानदान की..बड़ी बैचैनी लग रही है"...उसने अपनी ओर से दोनों महिलाओं को ढाढस बंधाया और भीतर चली गयी....कहते हैं कि जन्म और मृत्यु ईश्वर के हाथ है...उन दोनों महिलाओं में से एक को एक स्वस्थ्य बालक हुआ तो दूसरी को जन्म से ही एक मृत बालक हुआ...नर्स ने बाहर जाकर उनके परिजनों को यह बात बता भी दी...काम पूर्ण होने के बाद जब मेरी श्रीमती बाहर निकली तो उसने देखा कि डिलीवरी रूम के एक कोनें पर एक परिवार खुशी मना रहा था तो दूसरे कोनें पर बैठे परिवार के लोगों के आँसू नहीं थम रहे थे..वह भावनाओं के विरोधाभास में उलझी हुई वापस घर आ गयी...उसे शायद उस समय यह समझ नहीं आया कि वो किसे जाकर मुबारकबाद दे और किसकी आँखों से अविरल बहते आँसू पोछे...ज़िन्दगी कभी-कभी ईंसान को असमंजस के ऐसे ही मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है जहाँ वह निस्तब्ध होकर प्रकृति का तमाशा देखने के लिये मजबूर हो जाता है..एक को पीड़ा के बाद प्रतिसाद मिला तो दूसरे को प्रतिघात...पर ज़िन्दगी तो ज़िन्दगी है यूं ही बदस्तूर चलती रहेगी...सच है कि ख़ुशियों से लबरेज़ लम्हों में दर्द के अफसाने भी हैं....

Monday, April 18, 2011

शीशा हो या दिल हो आख़िर....टूट जाता है..


पढ़ने ये लाईनें महज़ फिल्मी नज़र आती है जिसके लिखे जाने के बाद शायर को मुँह मांगे दाम सौंप दिये जाते हैं उसके बाद बाक़ी का मसला फिल्मकार पर छोड़ दिया जाता है कि वह चाहे तो गाने को यादग़ार बना दे या फिर उसकी मटियापलीद कर दे ! पर लिखने वाले भी क्या ख़ूब होते हैं...कभी-कभी गानों की शक़्ल में ज़िन्दगी का गुज़र रहा हर लम्हा आपके सामने आ खड़ा होता है और हम यह सोचने को मजबूर हो जाते हैं कि मानों लगता है कि हमारी हक़ीक़त देख कर ही गीतकार ने लिखने की सोची होगी...! खैर जो भी हो आख़िरकार ऊन नज़्मों को रचने वाला है तो आदमज़ात...भला वो ज़िन्दगी के पहलुओं से क्यों वाबस्ता ना रहेगा...?? बहरहाल पोस्ट का मजमुआँ कुछ यूं है कि नये ज़मानें में मोहब्बत (लड़के-लड़कियों की) कितनी ख़तरनाक साबित हो रही है?? यक़ीनन अब वो ज़माना नहीं रहा जब प्रेमिका के विछोह में प्रेमी मारा-मारा फिरता था...मिलन और जुदाई के अफ़साने गाकर अपने आप को बहला लेता था..आज की हक़ीक़त निहायत ही ख़तरनाक है...आज के दौर का प्रेमी प्रेमिका के रूठने पर उसे मनाने के एक-आध कोशिश के बाद उसके मासूम चेहरे पर तेज़ाब फेंकनें की औक़ात रखता है...प्रेमिका के परिवार की रज़ामन्दी ना मिलने पर उनका क़त्ल तक कर देने का माद्दा रखता है...गोया यूं कह लिजिये की किसी को पाने की चाहत में हर नागवार कारनामों को अंजाम देने का हौसला रखता है....
हमारें संस्कार धानी कहे जानें वाले शहर में हालिया एक क़त्ल हुआ जहाँ लड़की के बालिग़-नाबालिग़ भाईयों ने ही मिलकर एक 18 वर्षीय नवयुवक को बड़ी बेरहमी से निपटा दिया...सुबह तक़रीबन 5 बजे लड़की ने ख़ुद फोन कर उसे शहर की चौपाटी पर मिलने बुलाया...सुबह-सवेरे अपनी बहन को बन-ठन कर बाहर निकलते देख भाईयों का शक़ पुख़्ता हुआ..लिहाज़ा वो उसका पीछा करते-करते चौपाटी तक पहुँच गये...दोनों को साथ में देखकर उनके ग़ुस्से ने आग़ की शक़्ल अख़्तियार कर ली...लड़का जान बचाने की नीयत से बग़ल के ही एक फॉरेस्ट डिपो में भाग आया...जहाँ पड़ी लकड़ियों से ही लड़की के भाईयों ने उसे इतना पीटा की बेचारे की जान शरीर से काफूर हो गयी...पेशे से पत्रकार हूँ लिहाज़ा बिलावजह मारी गयी लाशें देखने का ख़ासा अनुभव है पर उस मासूम की लाश देखी तो मन से एक गहरी आह निकल आयी जिसकी अनुगूंज अल्फ़ाज़ बन कर आपके सामनें है...छत्तीसगढ़ के दुर्ग शहर का एक क़िस्सा तो निहायत ही शर्मनाक है..बार-बार मशक्कत करने के बाद भी जब एक लड़की ने प्रेम संबंधों के लिये हामी ना भरी तो लड़के ने अपनें दोस्तों के साथ मिलकर उसे रास्ते से उठा लिया और एक मारूति वैन में सामूहिक रूप से उसके साथ मुहँ काला करते हुए रास्ते की एक सुनसान जगह के एक पेड़ पर फाँसी लगा दी...यक़ीनन दिल दहल जाता है ऐसी दास्तानें सुन कर...इसे आप मोहब्बत हरगिज़ नहीं कह सकते..ये तो सीधा-सीधा वहशीपन है जिसे मोहब्बत की चाशनी में जबरिया लपेटा जा रहा है..पहले-पहल दिल के टूटनें पर दर्द होता था अब दहशत होती है...कहा जाता है कि मोहब्बत में अकसर दिल टूट जाते हैं पर आज के दौर की मोहब्बत में यह टूटन भारी साबित हो रही है...!!!

Monday, March 14, 2011

कुश्ती का सिकन्दर मदद का तलबग़ार है....


महज़ सात साल की उम्र में डाक्टर की गलती ने उसके पैरों को लाचार कर दिया ! फिर पूरा बचपन खाट पर ही बीता ! पिता ने पलंग पर ही पंजा कुश्ती के गुर सिखाए और अब वह पंजा कुश्ती के अनोखे खेल में अंतराष्ट्रीय खिलाड़ी का दर्जा रखता है ! हम बात कर रहे हैं छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव शहर में रहने वाले राम सिंग की जिसने अपने मंसूबे से अपनी शारीरिक कमज़ोरी को मात देते हुए अंतराष्ट्रीय स्तर पर कामयाबी का मुकाम हासिल किया है
राम सिंग 
मन में चाह हो तो राह यकीनन मिल ही जाती है ! बचपन में ही अपने दोनों पैरों से लाचार होने के बावजूद राम सिंग ने अपनी पुरज़ोर हिम्मत को कायम रखते हुये अपने पिता हरजीत सिंग की मोटर मैकेनिक शाप में उनका हाथ बंटाते हुये मोटर गाड़ियों के ईंजिन रिपेयरिंग का काम सीखा और इसे ही अपनी आजीविका का साधन बना कर अपना काम जारी रखा ! गाड़ियों के भारी से भारी पार्टस आसानी से उसे उठाता देख कर दोस्तों नें उसे पावर लिफ्टिंग अभ्यास करने की सलाह दी और राम सिंग ने उस पर अमल करते हुये बकायदा जिम जाकर अभ्यास शुरू कर दिया ! अपने हाथों की मज़बूत पकड़ के एहसास ने राम को पंजा कुश्ती के लिये प्रेरित किया और अनेकों छोटी बड़ी पंजा कुश्ती प्रतियोगिताओं में हाथ आज़माने के बाद आसाम में हुई 27वीं सीनियर नेशनल आर्म रेसलिंग वर्ल्ड आर्म रेसलिंग में राम ने पहले स्थान पर कब्ज़ा जमा कर धूम मचा दी ! पिछ्ले दिनों ईटली में वर्ल्ड आर्म रेसलिंग फेडरेशन द्वारा आयोजित चैम्पियन शीप में राम सिंग को भारत का प्रतिनिधित्व करते हुये चौथे स्थान का गौरव भी हासिल हुआ है ! राम सिंग की इस बेहतरीन क़वायद के बाद भी उसे आज तक छत्तीसगढ़ सरकार से कोई मदद नहीं मिली है अलबत्ता छत्तीसगढ़ की खेल मंत्री लता उसेन्डी ने उल्टा राम सिंग से ही कह दिया की ये पंजा कुश्ती है क्या बला??
                   
पिछले दिनों राम सिंग का चयन 32 वीं वर्ल्ड आर्म रेसलिंग चैम्पियन शीप 2010 के लिये हुआ था जो की अमेरिका में आयोजित थी ! अपने चयन की सूचना का पत्र लेकर राम आर्थिक मदद की गुहार लेकर कहाँ-कहाँ नहीं भटका पर नतीजा सिफर रहा....अब तक पंजा कुश्ती के इस चैम्पियन की मदद के लिये न सरकार आगे आयी है और ना ही कोयी और दूसरी ज़रूरी मदद ! सरकार ऐक तरफ कामन वेल्थ गेम्स के नाम पर करोड़ो रूपये खर्च कर इसे अपनी उपलब्धी बता रही है वहीं दूसरी तरफ राम सिंग जैसे लोग प्रतिभावान होते हुये भी मदद की बाट जोह रहे हैं ! यह पोस्ट राम सिंग जैसे लोगों की विलक्षण प्रतिभा को आम जनता के समक्ष करने का एक प्रयास मात्र है जिसका उद्देश्य महज़ यह है कि ब्लॉगर जगत अपने प्रयासों से राम सिंग़ को उसके सही मुक़ाम तक पहुँचने में मददग़ार बन सके!!!

Tuesday, March 8, 2011

आदमी बनाम औरत


आदम को ईश्वर/अल्लाह/जीजस ने उत्पत्ति का पर्याय मान कर धरती पर भेजा है मौजुदा दौर में उसके हालात का पता कर पाना निहायत ही मुश्किल काम है ! यह पोस्ट मैं अपने एक बरसों पुरानें मित्र से मिलने के बाद उसकी रोज़ मरती ज़िन्दगी को देख लिख रहा हूँ...तक़रीबन गये हफ्ते ही एक शादी के सिलसिले में जयपुर (राजस्थान) जाना हुआ...मै बेहद खुश था कि शादी के दौरान अपने उस दोस्त से भी मुलाक़ात हो जायेगी जिसके साथ मेरे छोटे से ही सही मगर सांस्कृतिक रूप से समृद्ध नगर राजनांदगाँव में हमनें बचपन के बेहतरीन दिन ग़ुज़ारे थे...बचपन में वो शख्स बेहद चुलबुला सा था..शरारतें तो मानों उसकी नस-नस में भरी पड़ी थी..मेरे स्कूल के टीचर,सहपाठी,स्कूल की ही हॉकी टीम, सब के सब उसे देख कर ही रास्ता बदल लिया करते थे..स्कूल की लड़कियाँ अक्सर कहा करती थी.."दूर रहो उससे..वरना किसी दिन बुरे फंसोगे" मैं भी यह सब सुन तमाम बातों को दूसरे कान का रास्ता दिखा कर खत्म कर दिया करता था !
स्कूल की बॉयलाजी लैब में प्रेक्टिकल चल रहा था..सर ने एक दिन पहले ही चेता दिया था कि कल अर्थवर्म का डिसेक्शन करेंगे..इसलिये जहाँ मिले जैसा मिले अर्थवर्म (केंचुआ) पकड़ कर लाना...यह निहायत ही मुश्किल काम था पर उसने मुझे एक ख़ासा मोटा केंचुआ पकड़ कर दिया और कहा कि कल इसकी चीर-फाड़ की जवाबदारी तुम्हारी..मैनें पूछा और तुम्हारे लिये नहीं पकड़ा क्या? उसने कहा हो गया है बॉस डोंट वरी...अगले दिन लैब में सब अपने-अपने लाये केंचुये के साथ प्रेक्टिकल के लिये तैय्यार थे..मोम की प्लेट,डिसेक्शन बॉक्स सब रेडी था..सर ने कहा केंचुये को ध्यान से बाहर निकालो और पिन की मदद से मोम की प्लेट पर फिक्स कर दो..सब ने वही किया..तभी मेरे दोस्त के बगल में बैठी एक लड़की बदहवास सी लगभग चीखती हुयी बाहर निकली..एक पल को तो कुछ समझ नहीं आया पर मेरे दोस्त की मोम की प्लेट पर नज़र डाली तो सब समझ में आ गया..जनाब ने केंचुये की जगह एक ज़हरीले साँप के बच्चे को प्लेट पर लिटा रखा था...कुछ इस तरह उसके साथ बिता था मेरा बचपन और आज काफी सालों के बाद फिर से उस शख्स से मुलाक़ात के ख़्याल ने मेरी साँसों में बेचैनी ला दी थी....!
बहरहाल मैं अपनी शरीक़े हयात के साथ जयपुर पहुँच गया निकलने से पहले ही मैनें उसे फोन कर अपनी ट्रेन की पोजिशन/बोगी नं. सब की डिटेल बता दी थी...लिहाज़ा मैनें पत्नी जी को बोल रखा था कि देखना मेरे मना करने के बावजूद स्टेशन लेने आयेगा हमें...पर कुछ देर स्टेशन पर इंतेज़ार करने के बाद मेरा ख़्याल झूठा साबित हो गया और वो नहीं आया...शादी-शुदा मर्द बेहतर जानते हैं कि दूसरों के सामने भले ही उनकी जूतम-पैजार हो जाये पर पत्नी के सामने हुयी बेईज़्ज़ती बर्दाश्त नहीं होती...मैनें ख़ासी शर्म की चादर ओढ़ होटल का रूख़ किया...मैं जयपुर पहले भी कयी दफा आ चुका था..इसलिये शहर की अंजानियत मेरे आड़ नहीं आयी..वहाँ पहुँचने के पूरे दो दिन तक उसका कोयी फोन नहीं आया..मैनें सोचा या तो दोस्ती की अहमियत उसे पता नहीं या मेरा मोबाईल नं डिलिट हो गया होगा??मैं जिस शादी में शरीक़ होने गया था वो उस शख़्स के बेहद क़रीब के रिश्तेदार थे लिहाज़ा उसका शादी में आना तय था..उस शादी में मैं उसकी बेरूखी के चलते पूरी तरह मेहमान बनकर शामिल हुआ..शादी जयपुर के पॉश ईलाके मानसरोवर के एक बेहतरीन लॉन में थी...लॉन के बाहर पहुँचते ही मेरी धड़कनें थोड़ी तेज़ हो गयी कि अब तो उससे सामना हो ही जायेगा...तभी मैनें एक शख़्स को पीठ की ओर खड़े देखा जो किसी महिला से डाँट खा रहा था...मैं बेपरवाह भीतर की ओर जा रहा था कि पीछे से आवाज़ आयी "सॉरी यार...मैं तुझे लेने नहीं आ पाया" मैनें मुड़ कर देखा तो सामने वही शख्स खड़ा था जिसे मिनट मात्र पहले एक महिला गालियों से नवाज़ रही थी...ईत्तेफ़ाकन वही मेरे बचपन का दोस्त था...वो तेज़ी से मेरे पास आया और मुझसे लिपट कर बच्चों की तरह रोने लगा...मैनें आस-पास के लोगों को अपनी ओर घूरते देख उसे जैसे-तैसे सम्भाला और पत्नी को आगे बढ़ जाने का ईशारा करते हुये अपने दोस्त को लेकर थोड़े एकांत में आ गया..और सीधे पूछ बैठा कि क्या हुआ??कौन थी वो??उसने सुबकते हुये जो बताया उसे किसी पोस्ट में बयाँ करने की औक़ात शायद मुझमें नहीं है पर इतना कह सकता हूँ कि भारत अब पुरुष प्रधान देश हरगिज़ नहीं रहा है..मुझे इस बात का कोयी मलाल नहीं है...महिलाओं के प्रति सम्मानपूर्वक आज भी मेरा सर शिद्दत से झुकता है...पर ज़िन्दगी के तालाब की हर मछली ख़ूबसूरत हो ऐसा ज़रूरी तो नहीं है...मेरे दोस्त ने मुझे बताया कि वो पिछले पाँच सालों से ' पुरुष प्रताड़ना ' जैसे शब्द का शिकार है जिसके हिन्दुस्तानी क़ानून में कोयी माएने नहीं है...उसकी धर्मपत्नी उसे कयी दफे सरेआम पीट चुकी है...शरीर के कयी हिस्सों में तेज़ नाख़ूनों से खरोंचे जाने के निशान मौजुद हैं...मेरा दोस्त एक मल्टी नेशनल कम्पनी में अच्छी-खासी पोस्ट पर है..महीने के चालीस हज़ार कमा लेता है..घर पर एक मासूम बेटा भी है जो एक महंगे कॉनवेंट स्कूल का छात्र है...घर पर किसी चीज़ की कोयी कमी नहीं...फिर आखिर कौन सा कारण होगा इस प्रताड़ना का??यही सोच मैनें उससे साफगोयी से पूछा "कोयी दूसरी लड़की का चक्कर तो नहीं है??" उसने कहा कि "किसी से भी पूछ ले भाई अगर ऐसी-वैसी हरकत में मेरा नाम हो तो गर्दन काट देना मेरी"यह सुन मैं गहन चिंतन के अन्धकार में चला गया कि आखिर मेरी पुज्य भाभी के गुस्से की क्या वजह होगी??दूसरे दिन इसी यक्ष प्रश्न के दावानल में जलता हुआ मैं उसके घर पहुँचा तो देखा कि दरवाज़े के बाहर मेरे दोस्त का आठ साल का बेटा बेतहाशा रो रहा है...मैनें प्यार से उसके सर पर हाथ फिराते हुये पूछा कि क्या हुआ बेटा??उसने अपने सुर्ख लाल गालों में छपे उंगलियों के निशान दिखाते हुये कहा कि सायकल चलाते हुये गिर गया था तो मम्मी ने मारा...मुझे अब साफ तौर पर समझ में आ गया था कि ये समस्या अपने बस की नहीं है...पर किसी ना किसी को तो इसे सुलझाना ही पड़ेगा वरना बेवजह उपजे इस गुस्से के दाँव पर मेरे दोस्त जैसे कयी लोग निर्दोष होते भी चढ़ते ही रहेंगे...समानता का हक़/संसद में आरक्षण/सरकारी नौकरियों में तय स्थान की मांग करने और पाने वालों को इस ओर ध्यान देना भी लाज़िमी है...इतिहास गवाह है कि औरतों ने बलिदान की गाथाओं की ईबारत गढ़ी है...गिरते को उठना और रूकते को चलना सिखाया है...बद से बेहतरी के लिये, लिये जाने वाले हर ज़रूरी फैसले की समझ उनमें है..इसलिये उन्हें ही मेरे दोस्त जैसे लोगों की इस अबूझ समस्या का हल ढूंढना होगा..अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के इस शुभ अवसर पर इससे भला नेक काम और क्या हो सकता है...............!!

Saturday, February 12, 2011

गिरते हैं शह सवार ही मैदान ए मोहब्बत में....


बात महज़ चन्द साल पुरानी है..यकीनन यह ऐक किस्सा है जिसने ऐक कहानी की शक्ल अख्तियार कर ली है..मेरे ग्रेजुऐशन के आख्रिरी साल के दौरान हमारे कालेज मे ऐक लड़की ने ऐडमिशन लिया जो सुरत और सीरत से काफी साधारण थी..इस लिहाज़ से मैने कभी उस पर तव्वजो नही दी..मै उन दिनों अक्सर ख्याली दुनिया मे खोया रहता था लिहाज़ा मोर्डन ख्यालात के लोगों को मै अपना करीबी मानता था..बावजूद इसके मेरी उस लड़की से जान पहचान हो गयी !
उन दिनों कालेज के ड्रामा ग्रुप मे मेरी तुती बोलती थी..हमने युथ फेस्टिवल की नाटक प्रतियोगिताओ मे काफी ईनामात हासिल किये थे..नाटको के मंचन के सिलसिले मे हमें अक्सर बाहरी शहरो की सैर करनी पडती थी..और मै सफर के दौरान अपने मूड के साथियो की तलाश मे रहता था..पर मेरी तलाश हमेंशा अधूरी रहती थी..वो लड़की अक्सर मेरी तन्हाई बांटने का काम किया करती थी..और मै पंछियो को फेंके गए चारे की तरह अपने चुगे जाने का इंतेज़ार किया करता था...इंतेज़ार के लम्हों ने तीन बरस की उमर तय कर ली..इस बीच कुछ ऐसा हुआ जिसने मेरी ज़िन्दगी के माऍने बदल दिये..लगने लगा कि जैसे पूरी क़ायनात मेरे खिलाफ हो गयी है..ऐसे समय में भी उसी लड़की   ने हर क़दम मेरा साथ दिया..पर मै उसे वो मुकाम अता नही कर पाया जिसकी वो हक़दार थी..अक्सर मै उससे बात-बात पर नाराज़ हो जाता था..और वह चुपचाप रह कर मुझे शर्मिन्दगी के पानी मे डुबा जाती थी..उसने ज़िन्दगी मे मुझसे कभी कुछ नही मांगा..साफगोई से कहता हूँ मैने कुछ दिया भी नहीं...उसने ख़ुदा से खुद के लिये कभी कुछ नहीं मांगा...पर कहते हैं कि अल्लाह इंसान की पैदाईश से पहले ही उसकी तमाम ज़िन्दगी के फैसले लिख चुका होता है..यक़ीनन ऐसा ही कुछ मेरे साथ होने वाला था ! सुना है वक़्त हर ज़ख़्म भर देता है..पर मेरे लिये वो शख़्स ना होता तो मेरा ज़ख्म कब का नासूर बन चुका होता...लेकिन इन सब एहसानात का बदला चुकाने के अलावा मैं बाक़ी सारी ग़ैर ज़रूरी चीज़ों को अंजाम देता रहा..

कहते हैं कि उम्दा इंसान वही है जिसे फैसला लेना आता हो..मसलन क्या सही ? और क्या ग़लत ? सोचा और राह पकड़ ली...पर साफगोई से कहुँगा की गोया अक्ल मरदूद ठिकाने पर थी ही नहीं मेरी...लड़कपन की परवाज़ सच की ज़मीन पर कहा लैंड होती है वो तो कटी पतंगो जैसी बलखाती रह्ती है..लेकिन जिसे ज़मीन के बिखरे धागो को समेटना नही आता उसे फलक के सपनो का कालीन बुनने का कोई हक़ नही होता..और मैं एक बावला बन कर बेराह ज़िन्दगी जिये जा रहा था..पर वक़्त ने मुझ पर मेहरबानी करने की सोच ली थी..आख़िरकार उसकी मासुमियत नें दो अलग-अलग मज़हब को मानने वाले परिवारों को भी हमराह कर दिया..मेरे घर से ही मेरे बड़े दूल्हे भाई साहब ने उसे देखकर कहा कि इसकी शादी क्यों नहीं करा देते गोलु (मेरे घर का नाम ) के साथ...?? बस फिर होना क्या था..जिसके साथ मैनें शायद दो क़दम भी चलने का नहीं सोचा था वो मेरे साथ ताज़िन्दगी चलने वाले रास्ते का हमसाया हो गयी...पर अफसोस सिर्फ इस बात का है कि जब मुझे उसे पहचानना था तब मैं उसे सिर्फ मददगार की हैसियत से देखता था यक़ीनन यही बात वह भी सोचा करती है..और कहीं ना कहीं इसका मलाल भी उसे है...इस पूरे वाक़ये से मैं इतना तो समझ गया कि इंसान अगर इरादा कर ले तो बड़ी से बड़ी चोट खाकर भी संभल सकता है..और मैनें तो फक़त किसी की बेवफाई से रूसवाईयाँ झेली हैं..बहरहाल गिरते हैं शह सवार ही मैदान ए मोहब्बत में...

Saturday, February 5, 2011

ये लाल रंग कब हमें छोड़ेगा....??


दहशतगर्दी का प्रशिक्षण
प्रकृति के अनेक रंगो में से एक लाल रंग...लाल रंग की तासीर भी अपने आप में निराली है...ढलते सूरज पर जो लालिमा चढ़ती है.. उसे निहारते मन नहीं भरता..गोरी-नारी स्त्री की मांग पर सजा लाल सिन्दूर उसके सौन्दर्य को चार चाँद लगा जाता है..लाल रंग में लिपटी मौली पवित्रता की निशानी मानी जाती है..माँ अपने बच्चे को प्यार से लाल कह कर बुलाती है..मसलन यह कह लीजिये कि यह वो रंग है जिसकी बदौलत आज हम और आप ज़िन्दा हैं...जो रंग हमारी धमनियों में बह रहा है उसी लाल रंग की बेचारगी देखिये जो आज छत्तीसगढ़ के वन बाहुल्य इलाकों में दहशत का प्रतीक बन चुका है...रोज़ाना किसी ना किसी की नक्सली हमले में मौत की ख़बर अख़बारों की सुर्खियाँ रहती हैं..इतिहास की मृत्यु और विचारधारा के अंत की साजिशों को बेनक़ाब करने की क़वायद में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से शुरू हुये इस आन्दोलन का चेहरा इतना वीभत्स हो चुका है कि कभी शोषण के विरूद्ध लाल रंग का दामन थाम चुके इस आन्दोलन के प्रणेता लोगों की मृतात्मा भी खून के आँसू रोती होगी...

हथियारों से खेलते मासूम
यकीन नहीं होता कि स्पार्टाकस , माओ ,चेग्वेरा की दुहाई देने वाले इन भटके हुये लोगों को रक्तपात करने में इतना मज़ा आता है कि पिछले एक वर्ष में ही अकेले छत्तीसगढ़ राज्य में ही 1400 से अधिक निर्दोष जानें इनके हाथों जा चुकी है...बूढ़े, बच्चे , जवान ! इनकी वहशियाना गोलियों ने किसी को नहीं बख़्शा...यात्री बसों में धमाके,निर्माण कार्यों में वाहनों को जबरिया फूँक देना,छोटे मासूम बच्चों के नन्हें हाथों में बन्दूकें थमा देना बहादुरी नहीं कोरी बेशर्मी है...किसी ज़माने में नक्सलवाद के मायने अलहदा थे..लेकिन आज नक्सलवाद जिस मुकाम पर खड़ा है उसे देख कर यह क़यास आसानी से लगाया जा सकता है कि यह आन्दोलन अपने उद्देश्य से कब का और पूरी तरह भटक चुका है..नक्सली मामलों में संलिप्तता के आरोप में पकड़े गये विनायक सेन मामले में सच और झूठ से जुड़ी हक़ीक़त तो स्याह पर्दे के पीछे छुपी हुई  है लेकिन जिस तरह से मानवाधिकार संगठनों नें विनायक सेन के समर्थन में अपनी हाजिरी दी है उसे देख कर तो यह लगता है अगर सेन वाकई नक्सली गतिविधियों में संलिप्त हैं तो यह दुर्भाग्य ही है कि मानव के मूलभूत अधिकारों के लिये लड़ने वाले लोगों नें अपने आप को शुतुरमुर्ग की श्रेणी का मान रखा है जो रेत में मुँह छुपा कर यह सोचता है कि कोई भी आफत उसे देख नहीं पा रही है !

नक्सली हमले का शिकार यात्री बस
नक्सलियों के कारनामों पर क़सीदे पढ़नें वालों में एक नाम अरून्धति राय ने तो एक तरह से क़लमकारों को शर्मसार ही कर दिया..उन्हें चाहिये था कि पहले वो नक्सल हमलों के दंश की चपेट में आये लोगों से मिलकर अपनी राय क़ायम करती पर अफसोस उन्होनें ऐसा किया नहीं ! मैं ठहरा अदना सा साहित्य प्रेमी अमूमन किसी समस्या को लेकर पोस्ट लिखा नहीं करता पर एक नक्सल प्रभावित ज़िले में पत्रकारिता करते हुये मैं नक्सली हमलों की ख़ौफनाक हक़ीक़त से वाबस्ता हूँ...मुख़बिरी के शक़ में बेरहमी से पीट-पीट कर मारे गये निर्दोष ग्रामीणों की लाशे देखने की हिम्मत जुटाने की अब आदत सी हो गयी है...पर हाल में ही पड़ौसी ज़िले नारायणपुर से नक्सलियों द्वारा अपहृत पुलिस के जवानों के परिवार की आँखों से बहते अविरल आँसू देखकर रहा नहीं गया और अंगुलियां कीबोर्ड पर इस उम्मीद के साथ चल पड़ी कि  "दुनिया में कितना ग़म है..मेरा ग़म कितना कम है" बहरहाल लाल रंग का ध्वज थामें चन्द लोग छत्तीसगढ़ की धरती को निर्दोषों के रक्त से रोज़ बदस्तूर लाल कर रहे हैं और उन्हें रोकने की कोशिश में कई माँओ के लाल तिरंगे में लपेटे जा रहे हैं... ये लाल रंग कब हमें छोड़ेगा....?



Tuesday, January 25, 2011

26 जनवरी...


ए मेरे गणतंत्र..फूँक कुछ ऐसा जनता में मंत्र की पथ भ्रष्ट विचारों से उठ कर भारतीय बने आदमी...भगवान ना सही..देवता ना सही..अरे आदमी है कम से कम..आदमी तो बने आदमी...!!
उपर लिखी चन्द लाईनों में आज के हालात की सच्चाई बयाँ होती है.. हक़ीक़त करेले पर नीम चढ़ी सी साबित होकर हमें चिढ़ा रही है..ज़रा एक मिनट ठहरिये कहीं आप मुझे निराशावादी आदमी तो नहीं समझ रहे हैं यह सब पढ़ कर...कृपया ऐसा समझने की ग़लती कदापि ना करियेगा..ऊपर जो लिखा है वो एक राष्ट्रीय स्तर के अख़बार की सम्पादकीय है जो मैनें 26 जनवरी की ताज़ा सुबह पढ़ी है...अब अख़बार से प्रगतिशील भारत के निराशावाद की बू आती है तो मैं भला क्या कर सकता हूँ...अख़बार पर नज़र पढने से पहले टेलीविज़न पर ए.आर.रहमान का वन्देमातरम सुन और देख रहा था...जिसने दिन की शुरुवात में ही बसंती रंग घोल दिया था..पर अख़बार ने सारा मज़ा किरकिरा कर दिया सच हक़ीक़त घिनौनी ही नहीं बेमज़ा भी होती है....हम तो ख़ुदा का शुकर मनाते नहीं थकते की हम भारत के सबसे सुरक्षित राज्य छत्तीसगढ़ में रहते हैं.. भले ही महज़ एक और दो रूपयों में मिलने वाले सरकारी चावल खाकर बनिहार (मज़दूर) खेतों से नदारत हैं...शहर या गाँवों में राशन मिले ना मिले विदेशी ब्रांड की शराब सहज-सरल उपलब्ध है...नक्सलियों के हाथों रोज़ पुलिस के जवानों और मासूमों की मौत हो रही है...भू माफियाओं ने ज़मीन की क़ीमत आसमान से ऊंची कर रखी है...छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग जैसी महत्वपूर्ण संस्था ने बेरोज़गारों से खिलवाड़ का ज़िम्मा उठा रखा है...बावजूद इन सब के हम भारत के सबसे सुरक्षित राज्य छत्तीसगढ़ में रहते हैं..इस गुमान की हवा ज़रूर निकल गयी हो पर गुमान तो है कम से कम ! पर यकीनन छत्तीसगढ़ एक धनाढ्य और बेमिसाल राज्य है जिसकी माटी की अपनी एक निराली खूशबू है ! 26 जनवरी के मौके पर सभी ब्लागर बन्धुओं को ढेर सारी शुभकामनायें !!

Saturday, January 22, 2011

'मैं' उदयपुर और नाटक



ठंड के मौसम की आहट के साथ माह नवम्बर की शुरुवात से मैं और मेरे दोस्त साल भर की गहरी सांस्कृतिक शिथिलता से यकायक जाग कर युवा महोत्सव की एकांकी नाटक विधा की तैय्यारी में जुट जाते हैं ! यकीनन अब ज़माने की तमाम मसरूफियत के भंवर में पड़ने के बाद मुझे और मेरे दोस्तों को इस महोत्सव का बेताबी से ईंतेज़ार रहता है ! बहरहाल हमनें तैय्यारी शुरु की ! युवा महोत्सव की प्रतियोगितायें भिन्न-भिन्न चरणों में होती हैं ! ज़िला स्तर,फिर राज्य और अंत में राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व का मौका मिलता है ! हमारी मेहनत रंग लायी और हमारा दल राष्ट्रीय युवा महोत्सव जो 12 जनवरी से 16 जनवरी के मध्य उदयपुर राजस्थान में आयोजित था के लिये हुआ !
                    लगभग दो माह हमनें ताबड़-तोड़ मेहनत की ! नाटक के लेखक होने की महती ज़िम्मेवारी के साथ-साथ मैं नाटक में एक अदना सा लेकिन महत्वपूर्ण पार्ट अदा कर रहा था ! नाटक के निर्देशक और मेरे अजीज़ दोस्त शरद श्रीवास्तव ने सभी मौसमी कलाकार साथियों से कड़ी मेहनत करायी ! फ़ाका-मस्ती के दिनों में नाटक की प्रापर्टी,कास्ट्युम के जुगाड़ में पसीने छूट जाते थे पर अब अल्लाह के फ़ज़लो क़रम से मैं और मेरी टीम के ज़्यादातर लोगों के हाथ पैसों के मामले में तंग नहीं है लिहाज़ा सब ने दिल खोल कर खर्च किया और नाटक पूरी स्टेज प्रापर्टी ,ब्रोशर , कास्ट्युम के साथ राष्ट्रीय स्तर पर मंचन के लिये तैय्यार था ! 5 जनवरी यानी मेरे जन्मदिन पर राज्य के आला खेल अधिकारी श्री विलियम लकड़ा ने फोन पर बताया कि राज्य का दल 9 जनवरी को उदयपुर के लिये रवाना होगा ! इस पुख़्ता जानकारी के बाद मैनें अपने जन्मदिन पर अमुमन हर साल होने वाली पार्टी का ख़्याल दिल से निकाला और रिहर्सल को फाईनल टच देने की क़वायद शुरु कर दी ! कहा जाता है कि सियासत की गन्दगी से आज के हालात के मद्देनज़र अगर कोयी बच पाया है तो वह केवल और केवल कलाधर्मी ही हैं...पर हमारी टीम के साथ कुछ ऐसा होने जा रहा था जो इस मिथक को तोड़ रंगमंच को सियासतदानों का अखाड़ा बना कर मंच परे रंजिश का भौंडा प्रदर्शन करने वाला था ! 6 जनवरी को बेग़म साहिबा का जन्मदिवस पड़ता है जो यकीनन खुद के जन्मदिन से भी ख़ास मौका है..उस बेहद ज़रुरी दिन को भी रिहर्सल के नाम कुर्बान कर दिया हालांकि ऐसा करना इसलिये मुमकिन हो चला कि हमारी बेग़म खुद नाटक का एक अहम हिस्सा थीं !
7 जनवरी को संचालनालय खेल एवँ युवा कल्याण पहुँचने पर पता चला की राज्य स्तर पर एकांकी नाटक विधा में अपनी हार से क्षुब्ध कुछ युवा साथियों ने हमारी टीम के एक सदस्य के खिलाफ सूचना के अधिकार क़ानून को जबरिया हथियार बना कर कुछ ऐसा कर दिया है जिससे कि हमारे दल की राष्ट्रीय स्तर की युवा महोत्सव प्रतियोगिता में भाग लेने की पात्रता ही समाप्त हो जाये ! हमारी टीम किसी भी हालत में राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व ना कर पाये इसकी कोशिश में साजिशों का दौर शुरु हो चला था...संचालनालय के बाहर अर्धनंग प्रदर्शन / ख़िलाफत के लिये प्रेस कांफ्रेंस / बड़े नेताओं का हस्तक्षेप इतना सब कुछ सुन कर एक पल तो ऐसा लगा की मानों पैरों तले ज़मीन ही खिसक गयी हो...इतने दिनों की शिद्दत भरी मेहनत बेहतरीन मंचीय प्रस्तुति की सारी कोशिशें एक पल में ही दूर होती दिखायी देने लगी...पर ख़ुदा को शायद कुछ और ही मंज़ूर था..आख़िरकार कुछ फ़िरकापरस्त लोगों की खिलाफत के बावजूद भी हम लोग उदयपुर के लिये रवाना हो गये ! राजस्थान की सरज़मीं इतिहास के फसाने बयाँ करती है...उदयपुर की ताज़ी हवाओं में महाराणा प्रताप का शौर्य घुला हुआ है जो जिस्म को हर वक़्त तरो-ताज़ा रखता है...नाटक की भारी स्टेज प्रापर्टी ढोते-ढोते निकले दम में उदयपुर के अद्भुत सौन्दर्य ने नयी जान फूँक दी...वहाँ पहुँचने के दूसरे दिन खेल अधिकारी श्री विलियम लकड़ा ने बेमन से ही सही पर नाटक की उठा-पटक को लेकर छत्तीसगढ़ में चल रही राजनिती का फरमान हमें सुना दिया जो गोया यूँ था कि हमारे दल को नाटक के मंचन करने पर पाबन्दी लगा दी गयी थी...सुन कर सच कहूँ तो इतना गुस्सा आया कि बवाल मचाने वाले सामने होते तो जूतों की बौछार कर देता...पर जो होना था वो हो गया...कला ने भी राजनैतिक बिसात के सामने घुटने टेक दिये....अब इस बेहतरीन आयोजन में हमारे पास करने को कुछ भी बाकी नहीं था...लिहाज़ा आस-पास के पूरे ईलाके के भ्रमण का फैसला लिया गया..फिर क्या था..माउंट आबू, चित्तोड़ ,अजमेर शरीफ,पुष्कर जहाँ समय मिला घूम आये...साथ गये मित्र अतुल श्रीवास्तव की एक ब्लागर मित्र डा.अजित गुप्ता जो ईत्तेफ़ाकन उदयपुर में ही रहतीं हैं से मिलने का मौका मिला...जो उदयपुर यात्रा का सबसे सुखद पहलु साबित हुआ...उन्होंने मुझे अपनी लिखी एक किताब भी भेंट की...बहरहाल मेवाड़ की कालजयी गौरवशाली परम्परा की साक्षी रही नगरी उदयपुर की यात्रा कभी ना भूलने वाली याद बन कर मन में समायी रहेगी !!