Thursday, October 14, 2010

महाप्रलय की चपेट में टेपचु

आज से तक्ररीबन चालीस बरस पहले मध्य भारत में बसे छोटे से गांव टेपरी में रहने वाले चुन्नीलाल पंसारी के घर आश्विन शुक्ल की 1 तारीख को नवरात्रि आरम्भ के अति शुभ अवसर पर एक तेजस्वी मुख वाले बालक ने जन्म लिया..धार्मिक क्रिया कर्म की प्रक्रिया टेपरी के हर एक  घर में अपने चरम पर थी लिहाज़ा सब ने बालक के जन्म को ईश्वर का वरदान माना और अधिक जतन के साथ भगवान की भक्ति में स्वयं को सराबोर कर लिया..गांव के प्रकांड ज्योतिषी ने जब बालक के जन्म समय का विवेचन किया तो पाया कि बालक का जन्म मूल में हुआ है..जिसका सीधा-सीधा अर्थ था कि बालक की कुन्डली में दोष है...भक्ति में लीन चुन्नीलाल यह सुनते ही तनाव की स्थिति  में आ गया और बिना समय गंवाये ज्योतिषी महाराज से पूछा महाराज उपाय बतायें
ज्योतिषी महाराज ने भी अपनी पोटली खोली और पोथी पुराण खंगालने लगे..थोड़ी देर की माथा पच्ची के बाद चेहरे पर विजयी मुस्कान के साथ उन्होने कहा..मिल गया उपाय बस फिर क्या था.. चुन्नीलाल भगवान की तस्वीर के सामने नतमस्तक हुआ और बालक के साथ उपजी समस्या का समाधान जानने के लिये बैठ गया..महाराज ने बताया कि मूल काल में जन्मे बालक का नामकरण ऐसा होना चाहिये जो कि असाधारण हो..अर्थात ऊटपटांग किस्म का..इससे बालक की कुंडली के समस्त दोष समाप्त हो जायेंगे..इतना सुनते ही बगल में बैठे कलुवा नाऊ ने कहा ये तो टेपरी का चूहा नजर आत है..टेपचु कहीं का...अनायास ही ये नाम गूंजा ..टेपचु...और बालक का नाम अस्तित्व में आया टेपचु....ज्योतिषी महाराज मूल के दोष निवारण का खासा मोल लेकर चलते बने...चुन्नीलाल और उसकी धर्मपत्नि सावित्री की धर्म के प्रति गहरी आस्था थी.. टेपचु को उन्होने हमेशा सिखाया कि भगवान बुरे कर्म करने वाले को सज़ा देता है और अच्छे आदमी का हमेशा साथ देता है..इसी तरह छै बरस बीत गये..टेपरी में फैले हैजे ने चुन्नीलाल को लील लिया.. सावित्री और टेपचु अकेले रह गये..सावित्री ने अपने आप और हालात को भगवान के हवाले कर दिया..चौदह बरस की उम्र में एक दिन टेपचु ने मां से पूछा अगर किसी निर्दोष को इस दुनिया में किसी कारण सजा मिल जाये तो भगवान क्या करता है??सावित्री ने उसे बताया कि किसी निर्दोष को सजा देने पर भगवान का क्रोध धरती पर टूट पड़ता है..नदियों में बाढ़ आ जाती है..विनाश हो जाता है..प्रलय आ जाती है..महाप्रलय...अपनी मां की कही यह बात टेपचु के भीतर तक घर कर गयी और उसके बाद से वह भी श्रद्धा भाव से भगवान की उपासना करने लगा..गांव के प्रधान का बेटा ललन टेपचु का हमउम्र था पर टेपचु से उसकी कभी नहीं बनी..एक  बार तो ललन की हरकत पर सीधे-साधे टेपचु को भी गुस्सा आ गया था..ललन ने फांकामस्ती में टेपचु के कपड़ों पर तारकोल फेंक दिया था..बस टेपचु ने ललन को गांव भर में दौड़ा- दौड़ा कर पीटा था..जवानी की दहलीज़ पर कदम धरने के साथ-साथ ललन नाना प्रकार के व्यसनों का आदी हो चला था..टेपचु ने ललन को नेक सलाह देने के साथ मन में भगवान का भय रखने को कहा पर ललन ने हमेंशा टेपचु की उपेक्षा की..और बात-बात पर उससे झगड़े पर अनवरत उतारू रहने लगा..कुछ समय बाद पूरे गांव को इस बात का भान हो गया कि दोनों के बीच तनातनी बनी हुई है...दशहरे की रात टेपरी में जश्न का माहौल था..इस दिन गांव में मेला भी भरता है..गांव के तालाब पर बने प्लेटफार्म के ऊपर लगी स्ट्रीट लाईट के बन्द होने का लाभ उठाते हुए ललन पड़ौस के गांव के कुछ आवारा दोस्तों के साथ बैठ कर शराब की सरिता बहा रहा था..बदनसीब मुर्गियों की हड्डियां जहां-तहां बिखरी पड़ी थीं..जिसके ढेर ने धीरे-धीरे पहाड़ की शक्ल अख्तियार कर ली थी..कहावत है कि शराबी को शैतान बनते देर नहीं लगती..और ललन पर तो जैसे इब्लीस सवार हो गया था..नशे के सुरूर में ललन ने अपने बददिमाग दोस्त को कोई ऐसी बात बोल दी जो उसे इस हद तक नागवार गुज़री की रंजिश ने माहौल को खूनी मंज़र में तब्दील कर दिया..ललन के आस्तीन में छुपे सांप ने झूमा-झटकी के दौरान ललन का ही छुरा उसके पेट में घोंप दिया..ललन की ज़ोरदार चीख निकली और उसके सारे शराबी दोस्त मौका-ए-वारदात से भाग निकले..ललन अब भी वहीं पड़ा चीख रहा था..इत्तेफाकन टेपचु तालाब के बगल से गुज़रती पगडंडी से अपने किसी काम से गुज़र रहा था..अन्धेरे में किसी के चीखने की आवाज़ सुन कर वह चौंका और क्षण-क्षण नज़दीक आती चीख की तरफ बढ़ने लगा..स्ट्रीट लाईट ने इस बीच उजाले की आस के साथ टिमटिमाना शुरू कर दिया था..टेपचु ने देखा की मद्धम से उजाले में पड़ा कोई  चीख रहा है..टेपचु ने उसके नज़दीक आकर कहा..कौन है..?क्या हुआ..?ललन अपनी उखड़ती सांसो के साथ उसे पहचान गया और उसने कहा..टेपचु.......बुरी तरह घायल ललन ने अपना शरीर टेपचु और आत्मा भगवान के हवाले कर दी..ललन को टटोलने में टेपचु भी लाल रंग से सराबोर हो चुका था..दूर अन्धेरे में 8-10 टार्च की रोशनियां नज़दीक आती दिखी..और जब उस उजाले ने अपने आप को सामूहिक रूप से एक जगह स्थिर किया तो वहां पर ललन की लथ-पथ लाश के पास बैठा था टेपचु...तभी किसी ने थर्रायी हुई आवाज़ में कहा..ये तूनें क्या कर डाला टेपचु......?हालात की गहमागहमी टेपचु ने ज़रा भी नहीं भांपी थी..वो तो बस अवाक रह गया था..इसी बीच पुलिस भी आ गयी और बात जंगल की आग की तरह फैल गयी  कि टेपचु ने ललन को मार दिया है.... सावित्री के पैरों से तो ज़मीन ही खिसक गयी..वो जब पुलिस स्टेशन पहुंची तो देखा कि लोग थानेदार के सामने गवाही दे रहे हैं कि टेपचु ने ही रोज़ के झगड़ों से तंग आकर ललन का खून कर दिया है... सावित्री की लाख मिन्नतों के बाद थानेदार ने उसे टेपचु से मिलने दे दिया..टेपचु ने अपनी मां की सूजी हुई आंखो को सुकून देते हुए कहा कि मां तू घबरा मत मैं निर्दोष हूँ ..मुझे कुछ नहीं होगा..भगवान हमारे साथ है..लेकिन गवाहों के बयानात पर अदालत ने टेपचु को दोषी मानते हुए उसे फांसी की सज़ा सुना दी....फैसले के बाद टेपचु खामोश हो गया...जेल में अपनी मां से दोबारा मुलाकात में उस मासूम ने अपनी खामोशी तोड़ते हुए कहा मां मैं निर्दोष हूँ ..इन्हें समझाओ  ..मुझे अगर सज़ा दी गयी तो भगवान का क्रोध धरती पर टूट पड़ेगा..नदियों में बाढ़ आ जायेगी..विनाश हो जायेगा..प्रलय आ जायेगी..महाप्रलय...हज़ारों निर्दोष मारे जायेंगे..मां तू कुछ कर..कुछ कर...यह सुन सावित्री दहाड़े मार कर रोती हुई वहां से चली गयी...और तारीख 13 मार्च 1969 को सुबह 5 बजे टेपचु पंसारी वल्द चुन्नीलाल पंसारी को फांसी दे दी गयी..अफसोस उसके मरने के बाद आज तक महाप्रलय नहीं आई ..दुनिया जैसी थी..वैसी ही चलती रही...रह गयी बाकी तो बस बदहवास सी सावित्री...जिसका लाडला टेपचु यकीनन महाप्रलय की चपेट में आ चुका था....

4 comments:

  1. जनाब शोएब साहब ,
    सच कहूं तो बडी ही खूबसूरत और खूबसीरत कहानी है पर टंकण की त्रुटियों से इसका चेहरा दागदार हो चला है ! मुमकिन हो तो इसे सम्पादित कर लें...वर्ना पाठकगण वैसा ही फील करेंगे जैसा राजनांदगांव की सडकों पे चलनें वाले ! कहनें का मतलब ये कि कम्प्यूटर का गुनाह टेपचु के सर क्यों आये ?

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  2. जनाब अली साहब
    शुक्रिया फिर एक बार कि आपको कहानी पसन्द आयी..नौसिखिया टाईपिस्ट हूं..इस वजह से गड़बड़ हो जाती है..माफ किजियेगा..

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  3. वैसे ये कहानी नहीं है, हकीकत के काफी करीब है। एक कहावत भी है, नेकी कर दयिया में डाल। टेपचू जैसे कई लोग हैं जिन्‍होंने भलाई का काम किया और उन्‍हें उसका नुकसान उठाना पडा। फिलहाल बधाई हो एक अच्‍छी प्रस्‍तुति के लिए। रचना अच्‍छी है, इतनी अच्‍छी कि तुम्‍हारी भावनाएं दिख रही हैं, समझ आ रही है और ऐसे में थोडी बहुत टंकण त्रुटि को नजरअंदाज किया जा सकता है, पाठक समझदार हैं। हंस की तरह जो दूध तो पी लेते हैं और कंकड छोड देते हैं। बहरहाल एक बार और बधाई हो।

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  4. सर मन भर आया है ये पढ़ के आंखे छलछला उठी हैं इसके आगे लिखने की हस्ती तो नहीं है हमारी, इन्तेजार में

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