Sunday, October 3, 2010

मैं हिन्दुस्तान का अदना आदमी बोल रहा हूं....


पुलिसिया गश्त और मीडिया की जबरिया दहशत के साये में गुज़रे 30 सितम्बर 2010 की बेचारी तारीख के बाद की पहली सुबह मे अब तक सहमी हुई धूप में अपने आप को निहारता मैं हिन्दुस्तान का अदना आदमी बोल रहा हूं..सोचा!!चलो अच्छा हुआ..तमाशबीनों का मसला खत्म हुआ..चन्द बन्दे सियापा गायेंगे और चन्द खुशियों की मिठाईयां खा कर अगली सुबह फारिग हो जायेंगे..और मैं नया मसला या कह लिजिये मसाला मिलने तक चैन की बंसी बजाता रहुंगा..ईमान से कहुंगा पिछले तक़रीबन हफ्ते भर से मारे डर नींद उनिन्दा सी थी..कोर्ट ने पूरे हिन्दुस्तान की नींद काफूर कर रखी थी तो मैं तो ठहरा अदना आदमी..हाईकोर्ट के फैसले वाले दिन पडौस में रहने वाले सुखराम भाई और सुल्तान खान ने अपने आमने सामने मुहं वाली दुकाने नहीं खोली थी.. सुखराम भाई गाय का ताज़ा दूध बेचा करते हैं और सुल्तान खान की मसाला चाय स्टाल पूरे शहर में फेमस है.. सुल्तान खान की चाय का ज़ायका सुखराम भाई की दुकान से आये दूध के बिना अधूरा है लिहाज़ा दोनों की दोस्ती भी चाय में पड़ी अदरक और ईलायची की खुशबू की तरह लबरेज़ है..उस दिन सुखराम मुहं अन्धेरे ही उठ कर सुल्तान खान के घर आ गये..आते ही उन्होने सवाल दागा कि क्या होगा मियां आज??मुझे बड़ी फिक्र हो रही है सुल्तान भाई ने साफगोई से कहा करना क्या है..कोर्ट का फैसला जो भी आये तुम ईतना याद रखना अगर ईमाम बाड़े वालों का जुलूस निकला तो तुम भाभी और बच्चों को लेकर सीधे मेरे घर का रूख कर लेना और अगर कहीं शंकर पेठ वाले मोर्चा लेकर आये तो मैं तुम्हारे घर तशरीफ ले आउंगा.. सुल्तान का ईतना ही कहना हुआ कि सुखराम ने उठ कर फौरन उसे गले लगा लिया..दोनों के घरों का फासला उनके दिलों की तरह नज़दीक था..
कोर्ट के फैसले को लेकर बिलावजह मची जद्दोजहत से पिछ्ले दो दिनों से दोनों ने अपनी दुकाने बन्द रखी थी.. सुखराम जब भी दुकान खोलने की सोचता सुल्तान उसे माहौल की दुहाई देकर रोक देता.. सुल्तान के साथ भी अमुमन सुखराम ने हालात के मद्देनज़र ऐसा ही किया..आखिरकार कोर्ट ने मन्दिर-मस्जिद पर अपना फैसला सुना ही दिया..लोगों नें सच्चे हिन्दुस्तानी होने की मिसाल क़ायम करते हुए बेचैन माहौल में चैनों अमन की हवा चला दी..मद्धम सी फुसफुसाहटों के अलावा कहीं कुछ ना सुनाई दिया ना ही कुछ बेमज़ा नज़र आया..अगली सुबह सुखराम ने जब अपनी दुकान खोली तो पता चला की दुकान का फ्रीज बन्द पड़ जाने से उसमे रखा कई लिटर दूध खराब हो गया था.. सुल्तान की भी दुकान बन्द होने से उसे खासा नुकसान हुआ था..तभी मानों जैसे उसकी दुखती रग पर हाथ धरते सुखराम ने आकर कहा मैं तुझे पहले ही कह रहा था कि कुछ नहीं होगा दुकान खोल लेते हैं..पर तू माना नहींसुखराम का इतना ही कहना था कि धन्धे का नुकसान सुल्तान के मुँह से फूट पड़ा..उसने भी लपक कर कहा की मेरा भी दिमाग घास चरने गया था जो मैनें तेरी बात मानी..नुकसान के साथ-साथ बिलावजह ग्राहकी भी खराब हो गईऔर फिर दोनों की तू तू-मैं मैं, नें दूर तलक का सफर तय कर लिया..इस अदना आदमी ने सारा नज़ारा तफसील से देखा और पाया कि दंगे तक्सीम करने वाले फसादी तो नज़र नहीं आये लेकिन फसाद ज़रूर हो गया..बेशक़ सुखराम और सुल्तान का मुआमला तो सुधर जायेगा पर उन फिरकापरस्त लोगों का क्या जो मज़हब के तवे पर मतलब की रोटियां सेंक कर हिन्दुस्तान के हर अदना आदमी की ज़िन्दगी मुहाल कर देते हैं!! ऐ मेरे मौला ज़रा सुन मेरी..मैं हिन्दुस्तान का अदना आदमी बोल रहा हूं..!!!!

7 comments:

  1. सराहनीय पोस्ट के लिए बधाई .

    कृपया इसे भी पढ़े - -

    बीजेपी की वेबसाइट में हाथ साफ http://www.ashokbajaj.com

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  2. दिखाई देने वाली चीजों पे हुए झगडे सुलझनें में देर नहीं लगती ! आम आदमी को इसी से शुरुवात करना चाहिए !

    बहरहाल अच्छी पोस्ट !

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  3. अली साहब, अशोक बजाज जी, उदय जी
    शुक्रिया..पोस्ट की पाकीज़गी को निहारने के लिये..

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  4. रोज़मर्रा की ज़िन्दगी जीने वाला हर आम इंसान मज़हबिया फसाद से कोसो दूर है..मौजुदा हालात पर सटीक टिप्पणी..बधाई..

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  5. आम आदमी की बात को रखी न सिर्फ रखी बल्कि अच्‍छे तरह से रखी। अली साहब बधाई हो, एक मेसेज मेरे मोबाइल में 30 सितम्‍बर के फैसले के बाद आया था उसका जिक्र करना चाहूंगा- क्‍या बनाने आए थे क्‍या बना बैठे, कभी मंदिर बना बैठे कभी मस्जिद बना बैठे, हमसे तो जात अच्‍छी है परिंदों की कभी मंदिर पे जा बैठे कभी मस्जिद पे जा बैठे।
    ऐसे ही लिखते रहें एक बार फिर बधाई हो।

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  6. दोनों के घरों का फासला उनके दिलों की तरह नज़दीक था ...

    शोऐब भाई ये पोस्‍ट सीधे आपके दिल से निकल कर पब्लिश हुई है .. ... धन्‍यवाद.

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