Wednesday, September 29, 2010

अरे..अरे..मैं गिर पड़ा..

तीस बरस पहले ही तो उठा था मै
अपनी माँ के लिये/ऐक तेज़ दर्द बनकर
बाप के बुढापे का/ऐक सच्चा हमदर्द बनकर
पेट काटकर/रोटिया बांटकर
जिन्होने पाला
लगा दिया अरमानो पर उनके
मैनें अलीगढ़ी ताला
और चाबी फेंक दी अनंत में
और अंततः
अरे..अरे.. मैं गिर पड़ा..
ना जाने कौन/अब सम्भालेगा मुझे
यौवन से बुढापे तक/पालेगा मुझे
टूट गयी है मेरी/अभिवय्क्ती की लाठी
अब शेष है चढ़ना/चार कान्धो की काठी
रहेगी चुभन/कर ना पाया कुछ अपनो के लिये
राह तकती/बुढ़ी अम्मा के/सपनो के लिये
पथरीले जीवन पथ पर/संघर्षरत
अरे..अरे.. मैं गिर पड़ा..

(कापी राईट@मनमौजी)

3 comments:

  1. गिर पड़ना बहुत ही बुरी बात है शायद इसे गद्य में ज्यादा बेहतर कहा जा सकता था !

    ना जाने कौन ,संभालेगा अब मुझे ?...ये सवाल क्यों ? खुद पर ऐतमाद ज़रुरी है ! शब्दों को निराशावाद से बाहर आना ही चाहिए वर्ना ...मरी हुई कविता को भी चार कांधो की ज़रूरत होगी !

    कुछ और मेहनत की दरकार है !

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  2. @अली साहब
    अली साहब शुक्रिया आपके कमेंट के लिये..यकीनन ये चार कान्धो पर रखी कविता है है जिसे मैनें सन 1996 के मेरे लिये खराब हालातों में लिखा था..मेहनत की दरकार तो मुझे हमेशा से है..और यकीन मानिये वक़्त के इस दौर में खूब मेहनत कर भी रहा हूं.. दुवाओं का तलबगार..

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