Tuesday, September 28, 2010

औरत पर गीत....

हिम्मत का फौलाद लिये
आंखो मे ईक ख्वाब लिये
कड़ी धूप मे मोम की गुड़िया
अंगारो से खेल रही है
हॅस कर सब दुख झेल रही है..
बदलेगी ये समय की धारा
चमकेगा किस्मत का तारा
मेहनत ईक दिन रंग लायेगी
काली बदली झट जायेगी
कर्मयोगिनी भाग्य पटल पर
कर्म का खेला खेल रही है
हॅस कर सब दुख झेल रही है..







1 comment:

  1. मनमौजी साहब ये कविता अच्छी लग रही है पर ...वो कर्मयोगिनी है तो किस्मत के तारे के चमकने के फेर में क्यों पड़ा जाये ?

    प्रतिकूलताओं के विरुद्ध खड़े होने / खड़े रह सकने की बात अपनें आप में मायनें रखती है ...और उस वक्त सारा भाग्यवाद , डस्टबिन के हवाले किया जा सकता है !

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