Wednesday, September 15, 2010

पहली पाती..

क़लम लिखने को तरस रही है....
रोज़ाना की तरह आज भी यह महसूस हुआ
मेरी क़लम की स्याही उबाल मार रही है
कुछ कर गुज़रने की चाहत में कागज़ो को ढाल रही है
पैनी निगाहें ले शब्दो पर बरस रही है
मेरी क़लम लिखने को तरस रही है....
सोचा ! हत्या/लूट-खसोट पर उपन्यास लिख डालूं 
बर्बाद होते सुनहरे कल का आभास लिख डालूं 
या फिर लिखूं  लेख बेरोज़गारी पर
बर्तन धोती मुनिया की बेबस लाचारी पर
जो होटल मे ग्राहको को भोजन परस रही है
मेरी क़लम लिखने को तरस रही है....
कभी चाहा घोंट दूं अपनी क़लम की ही गर्दन
जो हर वक़्त मुख से आग उगलती है
सिद्धहस्त महारथियो को अजगर सा निगलती है
रसहीन छन्दो के मध्य जो निरंतर सरस रही है
मेरी क़लम लिखने को तरस रही है....

                    (कापी राईट @ मनमौजी)

2 comments:

  1. शोऐब भाई कविता में आपने मानवीय भावना के प्रवाह को सुन्‍दर शब्‍द दिया है किन्‍तु बिम्‍बों के मामले में तनिक ध्‍यान दीजिये। आपकी कलम की स्‍याही उबाल मार रही है कि आप सामाजिक विद्रूपों पर करारा प्रहार करें किन्‍तु, कलम की स्‍याही कागजों में उतरा करती है कागजों को ढ़ाला नहीं करती, शब्‍दों को बरसाती है शब्‍दों पर बरसती नहीं, आपने प्रयास अच्‍छा किया है, तुकबंदी नें अच्‍छा फासला तय कर लिया है कविता की लक्ष्‍य की ओर..... पहली पाती की शुभकामनांए.

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  2. @संजीव तिवारी
    तिवारी जी बहुत बहुत शुक्रिया आपके कमेंट के लिये..आपके द्वारा ईंगित समस्त पहलुवो पर ध्यान रखूंगा..शायद मेरी क़लम भी मेरी तरह मनमौजी है..जो बगैर किसी ख्याल के शब्दो को उकेरने लगती है...ऐसे वक़्त मे भी चन्द लाईने याद आ रही है.... मुश्किले दिल मे ईरादे उपजाती हैं
    सपनो के परदे निगाहो से हटाती हैं
    हौसला मत हार गिर कर ऐ मुसाफिर ठोकरे इंसान को चलना सिखाती हैं !!!

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