Wednesday, September 29, 2010

अरे..अरे..मैं गिर पड़ा..

तीस बरस पहले ही तो उठा था मै
अपनी माँ के लिये/ऐक तेज़ दर्द बनकर
बाप के बुढापे का/ऐक सच्चा हमदर्द बनकर
पेट काटकर/रोटिया बांटकर
जिन्होने पाला
लगा दिया अरमानो पर उनके
मैनें अलीगढ़ी ताला
और चाबी फेंक दी अनंत में
और अंततः
अरे..अरे.. मैं गिर पड़ा..
ना जाने कौन/अब सम्भालेगा मुझे
यौवन से बुढापे तक/पालेगा मुझे
टूट गयी है मेरी/अभिवय्क्ती की लाठी
अब शेष है चढ़ना/चार कान्धो की काठी
रहेगी चुभन/कर ना पाया कुछ अपनो के लिये
राह तकती/बुढ़ी अम्मा के/सपनो के लिये
पथरीले जीवन पथ पर/संघर्षरत
अरे..अरे.. मैं गिर पड़ा..

(कापी राईट@मनमौजी)

Tuesday, September 28, 2010

औरत पर गीत....

हिम्मत का फौलाद लिये
आंखो मे ईक ख्वाब लिये
कड़ी धूप मे मोम की गुड़िया
अंगारो से खेल रही है
हॅस कर सब दुख झेल रही है..
बदलेगी ये समय की धारा
चमकेगा किस्मत का तारा
मेहनत ईक दिन रंग लायेगी
काली बदली झट जायेगी
कर्मयोगिनी भाग्य पटल पर
कर्म का खेला खेल रही है
हॅस कर सब दुख झेल रही है..







Wednesday, September 15, 2010

पहली पाती..

क़लम लिखने को तरस रही है....
रोज़ाना की तरह आज भी यह महसूस हुआ
मेरी क़लम की स्याही उबाल मार रही है
कुछ कर गुज़रने की चाहत में कागज़ो को ढाल रही है
पैनी निगाहें ले शब्दो पर बरस रही है
मेरी क़लम लिखने को तरस रही है....
सोचा ! हत्या/लूट-खसोट पर उपन्यास लिख डालूं 
बर्बाद होते सुनहरे कल का आभास लिख डालूं 
या फिर लिखूं  लेख बेरोज़गारी पर
बर्तन धोती मुनिया की बेबस लाचारी पर
जो होटल मे ग्राहको को भोजन परस रही है
मेरी क़लम लिखने को तरस रही है....
कभी चाहा घोंट दूं अपनी क़लम की ही गर्दन
जो हर वक़्त मुख से आग उगलती है
सिद्धहस्त महारथियो को अजगर सा निगलती है
रसहीन छन्दो के मध्य जो निरंतर सरस रही है
मेरी क़लम लिखने को तरस रही है....

                    (कापी राईट @ मनमौजी)