Sunday, October 4, 2015

वहशियत का शिकार हुआ एक और बेगुनाह.....

 मेरे एक अजीज़ मित्र ने हाल में ही मुझसे कहा कि वो मक्का शरीफ में मारे गये हज यात्रियों की लाशे जे.सी.बी.से उठाये जाने वाली सोशल मीडिया में वायरल एक तस्वीर (जिसे गूगल भी फर्जी साबित कर चुका है) के मुद्दे को लेकर मूस्लिम जमात पर जमकर सोशल मीडिया पर गरियाने वाला था लेकिन ईत्तेफाक़न मेरा फोन आने के बाद उसने अपना ईरादा बदल दिया। आपने मेरे सम्मान का ख़्याल रखा इसलिये शुक्रिया मेरे दोस्त पर आज आपके सामने एक ऐसा दिल दहला देने वाला मुद्दा है जिस पर आप जैसे सुधिजनों की बेबाक़ क़लम क्या उगलती है?यह जानने की मुझे बेताबी से इंतेज़ार रहेगा ।
 भारत के दिल दिल्ली के क़रीबी ग्रेटर नोयडा के दादरी कस्बे के बिसाहाड़ा गाँव में एक गाय के वध की अफवाह मात्र के बाद गौ मांस घर में रखे जाने की एक तरफा पुष्टि करते हुये अकलाख़ मुहम्मद नामक एक व्यक्ति के घर तक़रीबन 200 लोगों की भीड़ ने हमला कर दिया । भीड़ ने अकलाख़ को पीट-पीट कर मार डाला ।हमले में अकलाख़ का बेटा दानिश भी बुरी तरह से घायल हो गया । अकलाख़ का पूरा परिवार वहशी भीड़ से गुहार लगाता रहा कि उसके घर गौ मांस का एक टुकड़ा भी मिले तो चाहे जो सज़ा दो ।लेकिन कथित गौ भक्त भीड़ ने उनकी एक ना सुनी और एक गौ वध की अफवाह के चलते इंसान और इंसानियत का बेरहमी से वध कर दिया । अकलाख़ के घर में हमलावरों ने फ्रीज में रखे मांस की भी तलाशी ली जो मौक़ा-ए-ईद पर लाया गया बकरे का गोश्त था ।पुलिस ने भी इस बात की पुष्टि की कि अकलाख़ के घर सिर्फ बकरे का मांस मिला और कुछ भी नहीं ।
 मेरे मित्रों मैं एक मुसलमान के घर पैदा हुआ हूं लेकिन ज़िन्दगी में मांस का एक टुकड़ा नहीं खाया... लेकिन आज मेरी क़लम किसी अपने मज़हब के व्यक्ति की जबरिया की गयी हत्या के लिये नहीं उठ रही है बल्कि इस लिये उठ रही है कि आपने साबित कर दिया है कि इस देश में अफवाहों का बाज़ार कितना गर्म है जिससे एक अफवाही गाय के वध की झूठी ख़बर ने एक भरे-पूरे परिवार की ज़िम्मेवारी संभालने वाले व्यक्ति का क़त्ल करवा दिया । अकलाख़ की बेटी साजिदा कहते फिर रही है कि उन उनके घर गौ मांस तो नहीं मिला...अब उसके पिता को लौटा सकते हो क्या..??

इस सवाल ने तो भीतर ही भीतर मुझे झंझोड़ के रख दिया है और अब मुझे आपकी प्रतिक्रिया का इंतेज़ार है....आप चाहे आलोचना करें...या कुछ और....सब सहर्ष स्वीकार रहेगा लेकिन अकलाख़ की हत्या ने कुछ लोगों को गौ मांस भक्षी तो नहीं वरन नरभक्षी ज़रूर साबित कर दिया है...आपको भड़ास निकालनी ही थी तो धड़ल्ले से गौ मांस खाने का दम भरने वाले अभिनेता ऋषि कपूर पर निकालते,काटजू पर निकालते,गौ मांस को बेहद लजीज़ बताने वाले आदरणीय गृह राज्य मंत्री साहब पर निकालते.....एक बेगुनाह को सरेआम मौत के घाट काहे उतार दिया मेरे सनातनी भाईयों..?? ख़ैर मैं तो ठहरा एक गौ भक्त लेकिन अब फिर एक ऐसी गाय की सेवा की तलाश में निकलता हूं जिसे बेकाम की साबित हो जाने के लिये बेतहाशा दौड़ते ट्रकों की चपेट में आने के छोड़ दिया जाता है । इस बार उसका एक नाम रखुंगा “अकलाख़”........

Friday, September 12, 2014

याद - ए - केदारनाथ

डिस्कवरी चैनल पर उत्तराख़ंड चारधाम हादसे पर हुये एक एपिसोड को देखते हुये मुझे वो लम्हा याद आ गया जब मैं अपने परिवार के साथ केदारनाथ यात्रा पर था ।हरिद्वार से एक प्राईवेट टैक्सी में सवार होकर हम निकल पड़े चारधाम यात्रा पर जिसमें हमारे सारथी रहे मामा...हम उन्हे इसी नाम से जानते थे । सुहाना मौसम,प्रकृति का अद्भुत सौन्दर्य जिसका विवरण केवल वही आंखे बयाँ कर सकती है जिन्होने ये नज़ारा अपनी नज़रों में क़ैद किया हो । 
केदारनाथ यात्रा के प्रारंभ स्थल गौरी कुंड से महज़ 9 कि.मी. की दूरी में पहाड़ों की गोद में बसे गाँव रामपुर में हमने रूकने का फैसला लिया था ।उन दिनों भी बारिश का मौसम अपने शबाब में था लिहाज़ा रास्तों पर पहाड़ों से गिरते पत्थर और  गहरी खाई में हादसे का शिकार हुई गाड़ियों का कबाड़ हमारे अंदर यात्रा का रोमांच और डर दोनों जगा चुके थे । गौरीकुंड के गर्म पानी में शुद्धता स्नान के बाद हमारी यात्रा खच्चरों पर सवार होकर शुरू हुई । रामपुर के ही रहने वाले एक महज़ 22-23 साल के लड़के शिवा ने हमारे लिये खच्चरों का बंदोबस्त किया था । 
गौरीकुंड से श्री केदारनाथ के मध्य 14 कि.मी. की यात्रा के बीच एक पड़ाव था रामबाड़ा । ये वही स्थान है जहां जून 2013 में हुये हादसे के बाद ये छोटा सा समूचा शहर बाढ़ के पानी में समा गया था । डिस्कवरी चैनल पर ये कार्यक्रम देखने के दौरान मुझे खच्चर वाले शिवा सहित वो सारे लोग याद आ गये जिनसे हमारी रामबाड़ा में मुलाक़ात हुई थी ।एक झोपड़ी नुमा होटल में हमें गरमा-गरम आलू के पराठे परोसने वाला छोटू,हमारे खच्चरों को गुड़ चना खिलाने वाला वो अनाम व्यक्ति जिनसे अचानक ही एक ऐसा रिश्ता जुड़ गया था जो अनजान जगह पर अपनेपन की एक अनोखी दास्तान की तरह था । पर उस हादसे में रामबाड़ा पूरी तरह नेस्तोनाबूत हो गया।
कहते हैं वहां कोई नहीं बचा। ईश्वर से बस यही प्रार्थना है कि शिवा सहित वो तमाम लोग जिनकी वजह से हम केदारनाथ यात्रा पूरी कर पाये वो स्वस्थ्य हों और यदि आपने उन्हे अपने पास बुला लिया हो तो उनसे कहना कि प्रकृति के इस अप्रीतिम खूबसूरती का नज़ारा हमें कराने के लिये शुक्रिया आपका ।
ज्योतिर्लिंगो में विराजमान ईश्वरीय शक्तियों से बस यही ईल्तेजा है कि मैं दोबारा उसी स्थान पर आना चाहता हूं बस मेरी एक मासूम सी शर्त है कि मुझे फिर एक बार हमारी यात्रा के सारथी रहे हरिद्वार के मामा,रामपुर के शिवा और लज़्ज़तदार आलू के पराठे खिलाने वाले छोटू सहित मेरा पहले की तरह खूबसूरती से बसा रामबाड़ा वैसे ही वापस कर दिया जाये जैसा हम कभी उसे छोड़ के आये थे  । उम्मीद है आप मेरी यह दुआ ज़रूर क़बूल करेंगे । आमीन ॥ 

Tuesday, October 8, 2013

मासूम के साथ कुकर्म : हद हैवानियत की..........

घटना के बाद गुस्साई लोगों की भीड़ 
महिलाओं के लिये सख़्त से सख़्त क़ानून बनने के बावजूद पूरे देश में बलात्कार जैसे अपराध बढते ही जा रहें हैं । इसमें किसी प्रकार का अंकुश लगता नजर नही आ रहा है । बलात्कार जैसे घृणित मामलों से मानवता प्रतिदिन शर्मसार होती जा रही हैं । बीते रविवार की रात छत्तीसगढ़ के संस्कारधानी कहे जाने वाले शहर राजनांदगांव 
आरोपी विक्रम उर्फ विक्की 

में वार्ड नं.11 के सोलह खोली  इलाके में एक 24 वर्षीय युवक द्वारा मोहल्ले की तीन वर्षीय बच्ची के साथ किये गये बलात्कार की घटना के प्रति जनमानस में रोष बढ़ता ही जा रहा है  ।आरोपी व्यक्ति को पुलिस द्वारा तत्परता दिखाते हुये घटना के थोड़ी देर बाद ही अपनी गिरफ्त में भले ही ले लिया हो पर इस जघन्य कुकर्म की घटना ने ईलाके में होने वाली पुलिसिया गश्त पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया है और मामले के आरोपी को त्वरित रूप से कड़ी से कड़ी सज़ा देने की मांग की जा रही है ।
आरोपी बच्ची का क़रीबी रिश्तेदार
ग़ौरतलब है कि  महज़ तीन साल की उम्र की बालिका के साथ बलात्कार की ख़बर ने पूरे शहर को हिला दिया है  । बलात्कार के आरोपी विक्रम उर्फ विक्की पिता गणेश जेदिया के बारे में बताया जा रहा हैं कि बच्ची के साथ कुकर्म करने वाला कोई और नही बल्कि पीडि़ता का क़रीबी रिश्तेदार ही है जो पेशे से मछली पकड़ने का काम करता है । रविवार की  रात 10 बजे जब घर पर बच्ची अपने चाचा के साथ थी उसी समय आरोपी विक्की पीडिता के घर पहॅूचा और बच्ची को चॉकलेट दिलवाने के नाम से घर के बाहर ले गया । मौहल्ले से दूर तालाब के किनारे ले जाकर आरोपी विक्की ने उस मासूम की मासूमियत को बेरहमी से रौन्द दिया । और बच्ची को उसी हालत में छोड़कर भाग निकला । बच्ची के  माता-पिता और मौहल्ले के लोगों ने काफी देर तक बच्ची को नदारत देखकर उसकी खोजबीन की तो उन्हें जानकारी मिली को बच्ची को अपने साथ लेकर गया आरोपी विक्की स्थानीय गौरीनगर तालाब के पास अकेला देखा गया है इसी बीच परिजनों की सूचना पर पुलिस की टीम भी मौके पर पहुंच गयी ।आरोपी के संबंध में जानकारी मिलते ही थाना प्रभारी अर्चना धुरंदर की अगुवाई में पुलिस की टीम ने विक्रम उर्फ विक्की की तलाश शुरू कर दी ।इसी बीच आरोपी के महादेव नगर में देखे जाने की सूचना पर पुलिस ने तत्काल वहां पहुंच कर आरोपी को अपनी गिरफ्त में लिया और थाने लेजा कर  कड़ाई से पूछताछ की ।
पुलिसिया मार के डर से उगला राज़ 
पुलिस की मार के डर से आरोपी ने सारी सच्चाई उगल दी और् बताया कि बच्ची गौरी नगर तालाब की पचरी के पास है  । पुलिस द्वारा बच्ची के परिजनो के साथ मिलकर उसे फौरन जिला अस्पताल लाया गया । जहां जिला अस्पताल के डॉ.विमल खूंटे तथा सी.एस. डॉ.मुन्ना मोहोबे  द्वारा बलात्कार की पुष्टि की गई ।  बताया जा रहा हैं कि आरोपी विक्की मोहल्ले में ही रहता हैं और बलात्कार की शिकार बच्ची के घर उसका लगभग रोज घर आना-जाना लगा रहता था । बच्ची की हालत नाजुक होता देख बच्ची को रायपुर के मेकाहारा चिकित्सालय रिफर  में रिफर कर दिया गया । जहां पर भी बच्ची सहित परिजनों को अव्यवस्था का शिकार होना पड़ा और काफी देर की मशक्कत के बाद कुकर्म की शिकार बच्ची का ईलाज शुरू किया गया ।
  
आरोपी को जनता के आक्रोश से बचाये रखा पुलिस ने


डॉक्टरों की जांच रिपोर्ट में बलात्कार की पुष्टि होते ही आरोपी विक्रम के प्रति जनता के रोष को देखते हुये उसे कोतवाली थाना से चिखली थाना शिफ्ट कर दिया और थाने जमा भीड़ को जैसे-तैसे शांत किया ।जनता द्वारा बार-बार आरोपी को उनके समक्ष एक बार प्रस्तुत कर देने की मांग की जाती रही पर मामले की गंभीरता को देखते हुये पुलिस प्रशासन स्थिति को संभालने में जुटा रहा । वारदात के दूसरे दिन तड़के ही पुलिस ने आरोपी को लालबाग थाना शिफ्ट कर दिया जहां से उसे न्यायालय के समक्ष पेश कर न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेजी दिया गया । आरोपी के खिलाफ धारा 363,376,307 सहित लैंगिक अपराधों से संबंधित बाल संरक्षण अधिनियम 2012 की धारा 4 (पॉक्सो)लगायी गयी है । 

Wednesday, August 21, 2013

ग़ज़ब ढायो "कांदा" जुलम भयो रे.......

शुरूवात मौजूदा दौर के भविष्य के एक फिल्मी डॉयलाग से....जहां एक लड़की सार्वजनिक रूप से छेड़छाड़ का शिकार होने पर कुछ इस तरह की बद्दुआयें दे रही है..." जा कमीने जा...भगवान तूझे तेरी इस ज़लील हरक़त के लिये कान्दे के एक-एक छिलके के लिये तरसाये....तुझे रसभरे प्याज़ का ईक टुकड़ा तक नसीब ना हो..."या फिर एक माँ अपने बच्चे से कह रही हो..." सो जा बेटे सो जा...वरना गब्बर घर की सारी प्याज़ उठा कर ले जायेगा..." ।
 वल्लाह क्या कोहराम मचा हुआ है महज़ एक कान्दे (प्याज़) के नाम पर....विपक्षी पार्टियां सरकार पर तोहमत पर तोहमत लगाये जा रही हैं....ईल्ज़ामों का दौर अपने शबाब पर है और इस देश का सबसे बिचारा कहलाने का दर्जा पाने वाले मध्यम वर्गीय परिवार के किचन से प्याज़ लगभग नदारत सा हो चला है....ख़ैर क्यों ना हो..?? 80 रूपये किलो में तो सरकार की अनुकम्पा से 80 किलो चावल का जुगाड़ किया जा सकता है तो फिर कांदे की परवाह काहे की जाये भई....?भारत के सर्वाधिक प्याज़ उत्पादक क्षेत्र नासिक में मौसम की मार झेल रहे किसानों की फसल पर आफत के परकाले गिर आये लिहाज़ा प्याज़ की कीमतों में बेतहाशा उछाल एक जायज़ प्रतिक्रिया थी....मुझे ईल्म है कि एन.डी.ए. सरकार के कार्यकाल के दौरान भी एक बार प्याज़ के दामों में इसी तरह बिजली गिरी थी...मसलन यह साफ है कि सरकार भले चाहे किसी की भी हो ये मुई महंगाई कम होने का नाम ही नहीं ले रही है...। साहेबान ये हालात हमें भविष्य की भयावह तस्वीर की ख़ौफनाक झलकियां दिखला रहे हैं....अगर आप आंकड़ो पर विश्वास रखते हैं तो इस ज़मीनी हक़ीक़त को मान लिजिये कि महंगाई की यह आफत अगर 25% आसमानी बला से उपजी है तो 75 फीसदी जनता को सौगात के तौर पर दी जाने वाली मुफ़्तखोरी से उपजी है ।
मैं छत्तीसगढ़ की माटी की देन हूं लिहाज़ा मै अपने ही राज्य के बारे में कहना चाहूंगा की मौजूदा सरकार इन दिनों सस्ता अनाज बांट-बांट कर उकता चुकी है सो नया पैंतरा ईस्तेमाल किया जा रहा है...सायकल/सिलाई मशीन/चप्पल/गाय/बैल और ना जाने क्या-क्या बेतहाशा बांटे जा रहे हैं....ट्रकों और मेटाडोरों में लाद कर लायी गयी जनता को जगह-जगह सभाये कर पैदल यात्रा/चप्पल यात्रा/जूता यात्रा/कपड़ा यात्रा बनाम यात्राओं के नाम पर बुला-बुला कर वस्तुओं का बंटवारा किया जा रहा है....तो जनाब कहने का मक़सद यह है की गोया यह सब चीज़ें आख़िरकार आती कहां से हैं...???ज़ाहिर सी बात है कि बांटने के लिये ईन्हें खरीदना भी पड़ता होगा....जिसके लिये पैसों की भी दरकार होती होगी....और सरकार के पास पैसा कहां से आता है यह बताने की ज़रूरत कम से कम इस प्लेटफार्म में तो हरग़िज़ नहीं है....सरकारी बजट हमेशा घाटे का भोंपू बजाता है कि फलाने क्षेत्र में इतने का घाटा हुआ...ढेकाने क्षेत्र में इतने का घाटा हुआ तो मांई-बाप ये मुफ़्तखोरी की रक़म क्या आप अपने ससुराल से लाते हैं जो चना-मुर्रे की तरह आम किये हुये हैं....??? अदना से कांदे की कीमत में उछाल हुआ, लगे सरकार को कोसने....पैट्रोल-डीज़ल के भाव बढ़े, लगे सरकार की फजीहत करने...किसी को कोसने-काटने से बेहतर है अपनी आदत में सुधार लाना....स्व.श्रीराम शर्मा जी ने भी कहा था कि हम बदलेंगे तो युग बदलेगा...पर ये चंद लोग हैं जो बदलने का नाम तो दूर बदलाव को मटिया-मेट करनें में तुले हुये हैं....ईधर रस्साला भारतीय रूपया रसातल में जाने को आतुर है वहां ये कांदा दिमाग का दही करने में तुला हुआ है । कभी-कभी तो लगता है कि सरकार से आर.टी.आई. के तहत पूछ ही लूं कि इन सब मुफ़्तखोरियों में कितनी रक़म का सत्यानाश किया है...पर घर-परिवार वाला हूं...घबरा जाता हूं क्योंकि छ.ग. में वर्ष 2012 को इंदिरा गांधी कृषि वि.वि. में हुये एक कार्यक्रम के दौरान एक शख़्स अनवर हुसैन ने सीधा प्रदेश के मुखिया को कह दिया था कि सरकार धान की उत्पादकता के जो आंकड़े बता रही है वो सरासर ग़लत है....फिर क्या बिचारे को जेल की हवा खानी पड़ी....परिवार को फजीलत अलग सहनी पड़ी...।
सत्ता के पावर के क्या कहने भई अच्छे-अच्छे तीस मार ख़ांन निपटा दिये जाते हैं फिर हमारी क्या बिसात....किचन से खाना बनाने वाली दीदी आवाज़ दे रही है..."भैय्या प्याज़ ख़त्म हो गयी है...लेकर आओ.."लिहाज़ा हम चुपचाप कांदे के कटने से पहले आँसू बहाते हुये प्याज़ लेने के लिये रवानगी भरते हैं....कमबख़्त एफ.एम.चैनल भी मुंह चिढ़ाता हुआ गीत सुना रहा है...जिसके बोल हैं "आमदनी अठन्नी..ख़र्चा रूपईय्या..........................॥ 



Tuesday, March 5, 2013

अल्पसंख्यक ग़रीब


मेरे एक मित्र जो की वारंगल आन्ध्र प्रदेश में रहते हैं..पेशे से किसान हैं...कल रात उनका फोन आया...
जनाब बड़े परेशान लग रहे थे....मैनें कहा मियां क्या बात है..?आख़िर इस परेशानी का सबब तो बतलाओ...
जब्बन मियां हैदराबादी ज़बान में तपाक से बोले....ये तुमईच लोगों की क़ारस्तानी हैं मियां जिसने हमें ग़फलत में डाल रखा है....
ले-दे के 11 एकड़ की ख़ेतीईच बाक़ी है उस पर भी हल चलाने वाले ग़ायब है मियां.....॥
 मुआमला मुझे ज़रा गंभीर लगा...मैनें कहा जब्बन मियां आपके यहां तो मज़दूर आसानी से मिल जाते हैं....आख़िर कौन सी बात हो गयी जो हालात इस क़दर बदतर हो गये...??
 जब्बन मियां बोले ये मज़दूरां मेरे को कहते हैं की पड़ौसी मुलुक (उनके मुताबिक़ हमारा राज्य) में बिटिया ब्याही है..हमारे दामाद भी उने खेतों में मजदूरी करते हैं...उने कई-कई दिन काम में नई जाते हैं फिर भी उने राशन-पानी की कोई कमी नई होती...उने की सरकार रूपया-दो रूपया में खाने को चावल चना उनके घरों तक पहुंचा जाती है...तुम हमें क्या देते हो मियां....इससे अच्छा है हम भी वहीं की रवानगी भर लें....
जब्बन मियां ने तो अपने दिल के फोड़े फोड़ लिये पर मौजुदा हालात का मवाद मेरे लैपटॉप के की बोर्ड पर बहा चला आया...यक़ीनन क्या इस राज्य में ग़रीब होना भी एक तरह का वरदान है..??
 खाने को सस्ता चावल/चना सरकार की नमक हलाली के लिये मुफ्त का नमक.....और बूढ़े-बुज़ुर्गों के लिये अब फ्री की तीर्थ यात्रा....
हे मेरी अति संवेदनशील सरकार...कुछ ध्यान ज़रा हम अल्प संख्यक गरीबों पर भी डालो.....महंगा चावल...महंगी दाल..महंगा तेल और 25 रूपये का टाटा नमक खाते-खरीदते जान आफत में आ गयी है...
और आपकी की इस दरियादिली का ख़ामियाजा गाहे-बिगाहे हमें ही उठाना पड़ता है, पल-पल बढ़ती महंगाई को गले लगाकर....वैसे पड़ौसी राज्यों के मजदूर भी आजकल एक नारा पुरज़ोर बुलंद कर रहे हैं जो कहता है "मैं आवत हवव फोकट के भात खाये बर"

Saturday, June 30, 2012

मैं सिपाही अमजद ख़ान बोल रहा हूं....


शहीद अमज़द ख़ान (फोटो साभार-श्री राजू दिवान धमतरी)

जंगलपारा नगरी ज़िला धमतरी छत्तीसगढ़...यही है मेरी जन्मस्थली...जहाँ मेरी ज़िंदगी ने पहली साँसे ली थी...उस दिन बहुत खुश थे मेरे पिता कलीम ख़ान जो की वनोपज के एक निहायत ही छोटे दर्जे के व्यापारी हैं...बचपन से मुझे वर्दी का बड़ा शौक था..वर्दी पहने लोगों को देखकर मुझे मन ही मन गर्व महसूस होता था...मैनें अपने अब्बा से कह दिया था कि देखना एक ना एक दिन पुलिस वाला बन के ही दिखलाउंगा....खेलों में भी मेरी गहरी रूचि थी....और अल्लाह के फ़ज़लो क़रम से मैं पढ़ाई में भी आला दर्जे का था...एक दिन मेरी चाहत रंग लायी और मुझे 2006 में ज़िला पुलिस बल में आरक्षक के पद पर तैनाती मिल गयी...मुझे याद है की ट्रेनिंग के बाद मैनें बड़ी शान से अपनी क़लफदार वर्दी अपने अब्बा को दिखलायी थी जिसे देख कर उनकी आँखे भर आयी थी...मैनें पूरी शिद्दत के साथ अपनी नौकरी को अमली जामा पहनाया था...
इस बीच पूरे प्रदेश को छोटे-छोटे ज़िलों में बांटने की क़वायद शुरू हो गयी थी जिसके मद्देनज़र बस्तर के घने जंगलो के बीच बसे एक सुविधा विहीन ईलाके सुकमा को ज़िले का दर्ज़ा प्राप्त हो गया...मुझे क्या मालूम था की आगे चल कर सुकमा का ईलाक़ा ही मेरी कब्रगाह बनने वाला था...मुझे अतिउत्साही कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन का गार्ड बना कर सुकमा भेज दिया गया...नक्सली मामलों में सुकमा के एक बेहद संवेदनशील ईलाके होने की वजह से सुरक्षा की हर चेतावनी को नज़र अंदाज़ करते कलेक्टर मेनन बीहड़ ईलाकों में भी पहुंचने से गुरेज़ नहीं करते थे और उनका सुरक्षा गार्ड होने के नाते मैं हर वक़्त साये की तरह उनके साथ रहा करता था...मुझे क्या पता था की साहब की नाफरमानी एक दिन मुझे ही साये की शक़्ल लेने के लिये मजबूर कर देगी...
अप्रेल का महीना सन 2012 जिसके बाद मेरी ज़िंदगी की क़िताब के अक्षर हमेशा के लिये विराम लेने वाले थे...ग्राम सुराज का सरकारी ढोल पूरे प्रदेश में ज़ोरों से पीटा जा रहा था...नेता,प्रशासनिक अमला गाँव-गाँव पहुंच कर फायदेमंद सरकारी योजनाओं की जानकारी आम जनो को दे रहा था भले ही फायदा किन ख़ास लोगों तक पहुंचता है यह बात किसी से छुपी ना हो पर एक शासकीय कर्मी होने के नाते हमें ग्राम सुराज को सफल बनाने के लिये तत्परता से काम करना था...कलेक्टर साहब सुराज अभियान के लिये कमर कस तैय्यार थे....सुकमा का बीहड़ ईलाका जहां तमाम तरह की सुविधायें यथार्थ से कोसो दूर हैं...सड़क की परिकल्पना ही की जा सकती है...कई गाँव ऐसे मुहाने में बसे हैं जहाँ चार पहियों पर तो क्या दुपहिया भी बड़ी मशक़्क़त के बाद पहुंचा जा सकता है....पर 2006 बैच के आई.ए.एस. अधिकारी एलेक्स पॉल मेनन की सुरक्षा में तैनात मैं और मेरा एक और छत्तीसगढ़ के ही रायगढ़ निवासी साथी किशन कुजूर की प्रतिबद्धता थी साहब की पूर्ण सुरक्षा की....
21 अप्रेल 2012 दिन शनिवार की सुबह मैं जल्दी उठ गया....मेरे साथी किशन ने मेरे उठते साथ ही उजली धूप की मुस्कान की तरह गुड मार्निंग कहा...और हम कलेक्टर साहब के साथ ग्राम सुराज अभियान की भेंट चढ़ने के लिये निकल गये.....जैसा मैनें पहले ही कहा है कि साहब बड़े उत्साही क़िस्म के व्यक्ति हैं....काम के आगे वो कुछ और नहीं सोचते...यहां तक की नाश्ता और भोजन भी...ये बात अलहदा है कि उनके पास महंगा फूड सप्लीमेंट हमेशा मौजूद रहता था जिसे हम जैसे मिडिल क्लास लोगों के लिये ख़रीद पाना अमूमन नामुमकिन होता है.....साहब के साथ सुराज अभियान का जायज़ा लेते हुये पूरा दिन बीता और फिर वो लम्हा आ गया जब मैं और मेरा साथी किशन इस ईंसानी दुनिया को हमेशा के लिये छोड़ कर जाने वाले थे...
शाम करीब साढ़े 4 बजे केरलापाल के मांझीपारा में ग्राम सुराज शिविर लगा था… बताया गया कि पहले से कुछ नक्सली ग्रामीण वेशभूषा में वहां मौजूद थे.... कलेक्टर साहब शिविर में बैठे हुए थे तभी एक ग्रामीण वहां पहुंचा और मांझीपारा में किसी काम दिखाने की बात उन्हें कही... जिस पर साहब अपनी स्कार्पियों में कुछ ही दूर निकले थे तभी 10 से 15 मोटर साइकिल में सवार नक्सलियों ने उनके वाहन को घेर लिया और पूछा कलेक्टर कौन हैं...?? पास के ही पेड़ के पास अपनी बाईक पर बैठे-बैठे मेरे साथी किशन कुजूर ने अपनी गन तानी ही थी कि उस पर गोलियों की बौछार कर दी गयी और वह वहीं ढेर हो गया....मैनें एक पेड़ की आड़ लेकर अपनी गन से नक्सलियों पर फायरिंग शुरू कर दी और एक नक्सली को ढेर करने में क़ामयाब भी रहा...पर मैं अकेला और नक्सली अधिक...आख़िर मेरी अकेली गन कब तक उनका मुक़ाबला कर पाती...तभी अचानक लगा की बहुत सी लोहे की कीलें मेरे शरीर में चुभती चली जा रही हैं....और उस चुभन का दर्द बयाँ करना शायद मरने के बाद भी मुमकिन नहीं है...ख़ून से लत-पथ मैं ज़मीन पर आ गिरा....मेरी आँखे धीरे-धीरे बंद हो रही थी और उस आख़िरी वक़्त में भी मैं ख़ुदा को याद करने की बजाय अपनी गाड़ी में बैठे कलेक्टर साहब को देख रहा था और मन ही मन अफसोस कर रहा था की मैं उनकी सुरक्षा नहीं कर पाया.....और फिर मैनें एक हिचकी के साथ अपना शरीर ज़मीन के और जान अल्लाह के हवाले कर दिया....
मैं तो इस दुनिया से दूर चला गया..लेकिन उसके बाद साहब को नक्सलियों की क़ैद से आज़ाद कराने की संभवतः तयशुदा क़वायद शुरू कर दी गयी...समझौते के बहाने नक्सलियों के बुज़ुर्ग समर्थकों को राज्य अतिथि के दर्जे से नवाज़ा गया...आने-जाने के लिये हैलीकॉप्टर मुहैय्या कराया गया...हर जायज़ और नाजायज़ मांगो को माना गया....और कलेक्टर साहब की सुरक्षित रिहाई हो गयी...आसमानी हवाओं में ऊड़ते-ऊड़ते बात आयी की साहब की रिहाई में सरकारी पैसों का भी जमकर लेन-देन हुआ....ख़ैर मैं अब इन सब ईंसानी हरक़तों से परे हूं लेकिन मेरे बेवजह गुज़र जाने के बाद सरकारी मदद की राह तकते किशन और मेरे परिवार को देख मन भर आता है...दिल में रह-रह कर एक टीस सी उभरती है...पर आँखों से आँसू नहीं निकलते...यक़ीनन राजनीत की चौसर पर मोहरों की तरह बैठे लोगों की चाकरी करने से बेहतर है ख़ुदा का यह आरामगाह...जहाँ कुछ मतलब-परस्त लोगों की वजह से शहादत झेल रहे लोगों की कमी नहीं है...और वह सब भी बेहद ख़ुश हैं...अरे..अरे मेरे अब्बा हूज़ूर अपने पुराने रेडियो पर एक गाना सुनकर...मेरी याद में फफक-फफक कर रो रहे हैं....गाना भी माशा अल्लाह कमाल का है....ज़रा आप भी सुनिये...”मतलब की दुनिया को छोड़कर..प्यार की दुनिया में...ख़ुश रहना मेरे यार”........॥ 

Thursday, March 29, 2012

मौत का राज़-फाश

मृतक रिंकू

छत्तीसगढ़ के राजनांदगाँव ज़िले का एक छोटा सा गाँव गर्रा जहां तरक्की के इस दौर में भी गाँव वालों ने आपसी रज़ामन्दी से एक ऐसा फैसला ले लिया जिससे पूरे ईलाके में दहशत का माहौल हो गया ।घटना से जुड़े मामलों की भनक गाँव वालों ने किसी को लगने नहीं दी पर जब राज़ फाश हुआ तो पुलिस महकमे सहित लोगों में सनसनी  फैल गयी ।
मृतिका नीलम्
प्रदेश के मुख्यमंत्री के विधानसभा क्षेत्र राजनांदगाँव ज़िले के छुईखदान थाना क्षेत्र में आने वाले गाँव गर्रा में ज़बरदस्ती शादी किये जाने से बचने के लिये एक प्रेमी जोड़े की आत्महत्या करने का सनसनीखेज मामला सामना आया है।गाँव वालों ने इस मामले में अजीब तरह की चुप्पी साध रखी है। गाँव का कोई भी निवासी ग्राम पंचायत के पंच,कोटवार सब खामोश हैं।
मृतक को इसी स्थान पर जलाया गया
कोई भी प्रेमी जोड़े के बारे में कुछ नहीं बोलना चाहता है।बीती 21 मार्च की रात से गायब गाँव के 23 साल के घनश्याम उर्फ रिंकू और 20 साल की नीलम के बीच मोहब्बत परवान चढ़ चुकी थी।दोनों ने साथ मिलकर जीने मरने की कस्में खा ली थीं पर दोनों के परिवार वाले इस बात पर उनसे बेहद नाराज़ थे और दोनों की अलग-अलग जगह शादी करवाने की कोशिशें भी जारी थी।पर 21 मार्च की रात दोनों नें अपनी मोहब्बत को एक खतरनाक अंजाम देने का फैसला ले लिया और दोनों ने गाँव के ही एक कोठार में ज़हर खा कर अपनी जान दे दी।
इसी नाले में बहा दी गयी दोनों की अस्थियां
 गाँव वालों को जब उनके घर मे ना होने की बात पता चली तो हड़कम्प मच गया और दोनों की पतासाजी करने पर दोनों को एक कोठार मे मरा पाया गया। प्रेमी जोड़ो की लाश देखकर पूरा गाँव सकते में आ गया और सब ने बदनामी से बचने के लिये दोनों की लाश एक ही रात में जलाकर मामले को रफा-दफा कर दिया। घटना स्थल से सारे जरूरी सबूत भी मिटा दिये गये यहां तक की दोनों की चिताओं की राख को भी पास में बहते एक नाले में डाल कर सारे सबूत मिटाने की कोशिश की गयी। एक तरफ तो हम 21 वीं सदी में होने का दावा करते हैं और दूसरी तरफ इस तरह की घटनायें तरक्की के माथे पर कलंक साबित हो रही हैं......॥